सागवाड़ा-ऋषभ वाटिका स्थित सन्मति समवशरण सभागार में प्रवचन में आचार्य सुनील सागर जी महाराज ने कहा कि जहां त्याग की भावना होती है वहां दान का अपना महत्व होता है। लेकिन दान सुपात्र को किया जाता है और त्याग स्वयं के लिए होता है। दान किया गया द्रव्य धन अथवा अन्य वस्तु दूसरों के काम आती है, जिसमें उपकार की भावना निहित होती है। दान अच्छी वस्तुओं और परोपकारी उद्देश्य के साथ सदुपयोग के लिए किया जाना चाहिए। आचार्य ने कहा कि दान में सबसे बड़ा दान अभयदान का होता है, लेकिन वर्तमान में स्थितियां निरंतर विपरीत होती जा रही हैं। आचार्य ने मुनियों के आहार दान पर तथाकथित दिखावा व्यवस्था पर प्रहार कर कहा कि मुनि त्यागी वृत्ति के होते हैं उन्हें भोजन नहीं भजन, उपवास तथा साधना से आनंद प्राप्त होता है फिर भी कुछ श्रावक इसका तमाशा बनाने में लग कर वास्तविक श्रवण परंपरा से दूर होते जा रहे हैं। आचार्य ने कहा कि ज्यादा प्रमादी और दिखावटी मत बनो क्योंकि घर में शुद्ध भोजन होना ही पर्याप्त है, चाहे वह घर सक्षम और अक्षम, गरीब अथवा अमीर का हो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

