डुंगरपुर-शहर में पहली बार जैन संत आचार्य अनुभवसागर जी महाराज के मुखारविंद से रामकथा होगी। इसके लिए आचार्य ने बुधवार सुबह पत्रकार वार्ता की और कथा के उद्देश्यों की जानकारी दी। यह कथा 24 सितम्बर से दशहरा मैदान में हर रोज सुबह साढ़े आठ से 10 बजे तक पांच दिन चलेगी। इस कथा में शहर के सभी समाजों के लोगों की भागीदारी रहेगी। जैन संत की ओर से की जाने वाली इस रामकथा को लेकर शहर में उत्साह का माहौल है। आचार्य ने भगवान राम के जीवन पर जानकारी देते कहा कि भगवान राम किसी सम्प्रदाय से बंधे हुए नहीं है। वो सार्वभौमिक है और प्राणी मात्र के आराध्य है। उनका पूरा जीवन संस्कारों की पाठशाला है और हर व्यक्ति को भगवान राम अपने भीतर आत्मसात करने चाहिए। वर्तमान में आधुनिकीकरण के तहत बदलाव हो रहे है। यह समय के साथ होने भी चाहिए। पर, हम हमारे संस्कारों से पीछे हटते जा रहे है। भगवान राम का जीवन दर्शन हमें त्याग, सहकार, मर्यादा, चरित्र और संस्कारों की नई दिशा देने वाला है और यह रामकथा इन्हीं सब को समर्पित रहेगी।
इच्छाशक्ति थी, तभी बदला शहर: आचार्य ने शहर के बदले स्वरूप का जिक्र करते कहा कि यह सब एक इच्छाशक्ति और बदलाव की जिद का परिणाम हैं। महज चार साल में यह गुमनाम शहर देश ही नहीं विदेशों में छा गया। सभापति ने संकल्प लिया। शहर को बदलने के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह शुरू हुआ। शहरवासियों का जुड़ाव हुआ और देखते ही देखते शहर बदल गया। यहीं बदलाव हमें अपने जीवन में करना हैं। हमें जो चाहिए, वो सबको देना होगा। यहीं भगवान राम का चरित्र है और इसे सबको अपने भीतर लेना होगा।
हर दिन एक नए अध्याय का होगा सूत्रपात
आचार्य ने बताया कि कथा का पहला दिन भगवान राम के संस्कार, अहिंसा का पालन को समर्पित रहेगा। दूसरा दिन प्रकृति संरक्षण से जुड़ा रहेगा। जंगलों में रहना और प्रकृति के नियमों को आत्मसात करने की प्रेरणा भगवान राम से ही मिल सकती है। यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। तीसरे दिन मर्यादा का पाठ होगा। इस दिन बड़ों के साथ शहर की स्कूलों में पढऩे वाले कक्षा 6 से ऊपर तक के सभी विद्यार्थियों को भी जोड़ा जाएगा। बच्चों को समझाया जाएगा कि असली हीरो फिल्म के अभिनेता नहीं, भगवान राम है। चौथा दिन मां सीता के चरित्र को समर्पित रहेगा। स्त्री का सम्मान तभी होगा, जब वो स्वयं चाहेगी। स्त्री का आभूषण चरित्र है। यह सीता मैया ने साबित किया और वर्तमान में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। कथा के अंतिम दिन जिले भर के सभी संप्रदायों के संतों का सानिध्य मिलेगा। यह सब भगवान राम के चरित्र को प्रस्तुत करेंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
इच्छाशक्ति थी, तभी बदला शहर: आचार्य ने शहर के बदले स्वरूप का जिक्र करते कहा कि यह सब एक इच्छाशक्ति और बदलाव की जिद का परिणाम हैं। महज चार साल में यह गुमनाम शहर देश ही नहीं विदेशों में छा गया। सभापति ने संकल्प लिया। शहर को बदलने के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह शुरू हुआ। शहरवासियों का जुड़ाव हुआ और देखते ही देखते शहर बदल गया। यहीं बदलाव हमें अपने जीवन में करना हैं। हमें जो चाहिए, वो सबको देना होगा। यहीं भगवान राम का चरित्र है और इसे सबको अपने भीतर लेना होगा।
हर दिन एक नए अध्याय का होगा सूत्रपात
आचार्य ने बताया कि कथा का पहला दिन भगवान राम के संस्कार, अहिंसा का पालन को समर्पित रहेगा। दूसरा दिन प्रकृति संरक्षण से जुड़ा रहेगा। जंगलों में रहना और प्रकृति के नियमों को आत्मसात करने की प्रेरणा भगवान राम से ही मिल सकती है। यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। तीसरे दिन मर्यादा का पाठ होगा। इस दिन बड़ों के साथ शहर की स्कूलों में पढऩे वाले कक्षा 6 से ऊपर तक के सभी विद्यार्थियों को भी जोड़ा जाएगा। बच्चों को समझाया जाएगा कि असली हीरो फिल्म के अभिनेता नहीं, भगवान राम है। चौथा दिन मां सीता के चरित्र को समर्पित रहेगा। स्त्री का सम्मान तभी होगा, जब वो स्वयं चाहेगी। स्त्री का आभूषण चरित्र है। यह सीता मैया ने साबित किया और वर्तमान में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। कथा के अंतिम दिन जिले भर के सभी संप्रदायों के संतों का सानिध्य मिलेगा। यह सब भगवान राम के चरित्र को प्रस्तुत करेंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

