सागवाड़ा-ऋषभ वाटिका स्थित सन्मति समवशरण सभागार में प्रवचन में आचार्य सुनील सागरजी महाराज ने कहा कि दान अगर दूसरों के कल्याण और परहित के लिए लिया जा रहा है, तो फिर अपमान को सहन करने की शक्ति स्वत: प्राप्त हो जाती है।
क्योंकि ज्ञानी के लिए अज्ञानी और मूर्ख के शब्द बाण भी दान जैसे ही महत्वपूर्ण होते हैं, तथा जो ज्ञानी होता है। अव्यवहारिक और प्रताड़ना का भी सदुपयोग कर लेते हैं उन्होंने कहा कि वास्तव में नाम उसी का होता है जो औरों के काम आता है तथा औरों के वही काम आता है जो भेद विज्ञान को समझता है, उन्होंने कहा कि सागर सावन देता है उपवन मधुबन देता है जीवन तो उसी का सार्थक है जो औरों को जीवन देता है। आचार्य ने कहा कि देश के बुंदेलखंड क्षेत्र में जिनवाणी जिनशासन और धर्म प्रभावना के साथ शिक्षा की अलख जगाने वाले वैष्णव धर्मि गणेश शंकर वर्णिका का नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है। आचार्य ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत एवं आचार्य गुरु के मार्गदर्शन का पालन कर जीवन को बहुउपयोगी बनाया जा सकता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
