कर्मों की पूंजी से जीवन का उद्धार करना चाहिए : आचार्य सुनील सागर जी



सागवाड़ा-आचार्य सुनील सागर जी  महाराज नें शुक्रवार को ऋषभ वाटिका स्थित सन्मति समवशरण सभागार में प्रवचन में कहा कि शरीर वास्तव में पराधीनता का धोतक है, जबकि आत्मा अजर-अमर होने के साथ ही स्वतंत्र है।
आत्मकल्याण के मार्ग की और आगे बढऩा आवश्यक है। आचार्य ने कहा कि भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में हमारे पुरखों का दिया गया योगदान और उनके रीति-नीति के सिद्धान्तों से प्राप्त संस्कारों के कारण आज हम बहुत गौरवान्वित महसूस करते हैं। हर पिता की यह ख्वाहिश होती है कि वह अपने बच्चों को वह सब दे जो उसने प्राप्त नहीं किया है , यह सोच अच्छी है मगर बच्चों को अगर देना ही है तो बुजुर्गों द्वारा स्थापित संस्कृति, सभ्यता, शालीनता तथा सद्भाव के संस्कार ज़रूर देवें जो हमें विरासत से प्राप्त हुए है।
         संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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