आत्मानूभूति का प्रथम सोपान उत्तम आकिंचन्य धर्म है-बाल ब्रह्मचारी प्रदीप शास्त्री पीयूष



कोटा (राज)-एक मात्र आत्मा ही अपना है बाकी सब पर पदार्थ है। वे मेरे नही है ऐसा मानना जानना ओर ओर उनमे लीन न होना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है ।*
परिग्रह का नितांत अभाव होने पर आकिंचन्य भाव प्रकट होता है।आत्मानूभूति का प्रथम सोपान है आकिंचन्य धर्म।जो निर्ग्रन्थ मुनि है उनके ही यह उत्तम आकिंचन्य धर्म प्रगट होता है।
उक्त उदगार बाल ब्रह्मचारी प्रदीप शास्त्री पीयूष ने उत्तम आकिंचन्य धर्म के दिन आर के पुरम स्थित श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन त्रिकाल चौबीसी मन्दिर में व्यक्त किये।मंदिर समिति के अध्यक्ष के अध्यक्ष जिनेंद्र बरमुंडा महामंत्री राजेश जैन खटोड़ प्रचार प्रसार मंत्री राष्ट्रीय संवाद पारस जैन पार्श्वमणि ने बताया कि*
*मूलनायक भगवान का प्रथमाभिषेक करने  का सौभाग्य श्री मान महेन्द्र जी, श्री मति इंद्रा जी, रोहित जी, श्री मति सोनिका जी, कु.हिमाया* *जी,  लाम्बाबॉस परिवार
*₹मूलनायक भगवान पर शांतिधारा*का सौभाग्य*
*श्री मान ज्ञानचन्द जी, श्री मति सीमाजी, अभिषेक* *जी, कु.स्तुति जी, जैन परिवार, खजुरी वाले को*
*सायकालमहाआरती* *करने* *का सौभाग्य श्री मान अशोक जी, अमन जी, बरमुण्डा परिवार, मंडाना वाले को मिला।*
*धर्मसभा मे सूरजमल जैन हरकचंद गोधा अशोक पाटनी मनोज बाकलीवाल अजित जैन दिलीप बड़जात्या बाबूलाल जैन मयक जैन महावीर जैन अजित जैन सुनील ठोरा ललित जैन चन्देश जैन प्रकाश सेठिया भाग चंद जैन वीरेन्द्र जैन संजीव जैन अरिहंत उपस्थित थे ।*
*प्रस्तुति :-राष्ट्रीय संवाद दाता  पारस जैन " *पार्श्वमणि पत्रकार कोटा

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