मनुष्य का पूरी तरह स्वयं पर नियंत्रण रखना ही संयम धर्म : दुर्लभमति माता


बंधाजी-अतिशय क्षेत्र बंधाजी  में दुर्लभमति माताजी  के सानिध्य में जिनेंद्र भगवान की महाअर्चना की जा रही है। रविवार को प्रवचन में दुर्लभमति माताजी  ने कहा कि दस लक्षण पर्व का छठवां दिन उत्तम संयम का दिन है। बंधा कमेटी के अध्यक्ष मुरली जैन बंधा ने बताया कि रविवार को सुगंध दशमी के पावन अवसर पर अजितनाथ भगवान का महामस्तकाभिषेक किया गया।
दुर्लभ मति माताजी  ने संयम धर्म के पर बताते हुए कहा कि जिस प्रकार से घोड़े को यदि लगाम न लगी हो, तो घोड़ा बेकाबू होकर अपने सवार को किसी खड्डे में गिरा देता है। इसी तरह इन्द्रियों पर आत्मा यदि अंकुश न लगाए तो इन्द्रियां भी आत्मा को दुर्गति में डाल देती हैं। पूरी तरह स्वयं पर नियंत्रण रखना ही संयम धर्म है। अपनी इंद्रियों को अपने बस में रखना संयम धर्म है। इस कारण अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण लगाकर इन्द्रियों को अपने वश में रखना जरूरी है। यही संयम धर्म का सार है। हमारे जैन दर्शन में अकेले अनुशासन की बात नहीं होती, अनुशासन के साथ संयम भी बहुत जरूरी है। संस्कारों को परिमार्जन करने का नाम संयम है। संयम के बिना ज्ञानी लोग भी बुरे आचरण में फंस जाते हैं। साधक साधना करने लग जाए तो वह कई सिद्धियां प्राप्त कर सकता है। इसलिए कहा गया है कि संयम की ताकत कोई समझ नहीं पाता।
छोटे-छोटे कदमों से चलकर हम बड़े-बड़े रास्ते तय कर लेते हैं और छोटे-छोटे नियमों का पालन करके हम अपना मोक्ष मार्ग का रास्ता प्रशस्त कर सकते हैं। अपने मन और इंद्रियों को संस्कारित करने का नाम संयम ही हैं। मछली रसना इंद्रिय के वशीभूत होकर अपनी जान गवा देती है। चक्षु इंद्री के वशीभूत होकर छोटे-छोटे कीड़े पतंगे अपनी जान गवां देते हैं। एक इंद्रिय जीवों के वशीभूत होकर यह हाल है, तो मानव पंचइंद्रिय जीव है, उसका क्या हाल होगा। संयम धर्म हमें सिखाता है कि हमें फास्ट फूड से बचना चाहिए। इन वस्तुओं के सेवन से हमें हिंसा का दोष लगता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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