विवेक के बिना ज्ञान का सदुपयोग नही हो पाता समयसागर जी



रहली-मुनि श्री समय सागर जी महाराज ने कहा योग्यता के अभाव में ज्ञान देना उचित नही है, क्योकि विवेक के बिना ज्ञान का सदुपयोग नही हो पाता। जैन धर्मशाला मे मागलिक उदबोधन देते कहा आत्म जीव के पास अनन्त गुण विद्यमान है, परन्तु वह सारे गुण वर्तमान मे उदघाटित नही हो पा रहे है।
अनन्त को परिभाषित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि आय का अभाव है फिर भी व्यय निरंतर हो रहा है। अंत जिसका न हो उसे अनन्त कहते है, वर्तमान में साधना को साधन उपलब्ध है क्या, चतुर्थ काल के साधन उपलब्ध नही, पर तीर्थकर का संकेत शास्त्रो के माध्यम से वर्तमान के ध्यान से वस्तु को जानने के लिये उपयोग किया जाता है। ज्ञान का अन्य क्षेत्र में उपयोग होने पर आत्म तत्व पर ज्ञान का प्रकाश नही डाला जा रहा है।
मुनि श्री ने कहा ज्ञान अनंत गुणों को प्रकाशित कर सकता है पर आत्मा के ज्ञान को भरा नही जा सकता और दिया ज्ञान ओपचारिक होता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान के आवरण को हटाने का प्रयास देव, शास्त्र, गुरु के उपदेश से किया जाता है। ज्ञान का अंत नही, ज्ञान तो अनन्त है। ज्ञान वर्तमान मे ज्ञानावरणीय मोहनीय कर्मो के कारण विलोपित होता जा रहा है। समवसरण में प्रभु की दिव्य वाणी ख़िरने पर गणधर द्वादशांग की रचना करते है, तब हमें ज्ञान मिल पाता है। द्वादशांग के सामने हमारा ज्ञान बून्द के समान है। उन्होंने कहा कि आगम में मिलता है कि णमोकार की साधना नही फिर भी केवलज्ञान प्राप्त किसके बल पर मिलता है। गुरु कितना भी पढाये पर समझ नही आता, लेकिन गुरु के प्रति समर्पण का भाव होता है। गुरु के बताये मार्ग पर चलो, उसी से हमारा कल्याण होगा। गुरु ने कहा की चार हाथ का रास्ता देख करके चलो, जीवो को बचाने चलने से ही अहिंसा धर्म का पालन हो जाता है जीवो की रक्षा ही पर्याप्त ज्ञान है।
आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गुरु आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज मुनि बनने से पूर्व पंडित भुरामल थे, उन्होंने बड़े बड़े सहित्य ग्रंथ लिखे , जिन्हे पढ़कर सभी आश्चर्यचकित हो जाते है उन्होंने एक जयोदय ग्रथ लिखा पर उसका प्रकाशन नही हुआ। तब लोगो ने उनसे कहा तो उन्होंने कहा प्रचार प्रसार मेरा काम नही है। कहा सभी को चकित कर गया मैं साधक हु , प्रचारक नही।आजकल के ज्ञानी चार लाइन लिखी नही उसे गुनगुनाते फिरते है। आजकल ज्ञान दर्शन का नही प्रदर्शन की वस्तु हो गया है। अगर ज्ञान है तो स्वयं आप में प्रकाशित होता हैं फिर भी पृथक रूप दिखाने की बात क्यो। यह ठीक नही होता। ज्ञान की सुंगंध स्वयं फैलती और लोग उससे लाभाँवित होते रहते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमण्डी

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