जैन मुनि तरुण सागर को दी श्रद्धांजलि ,25 वर्ष पूर्व पधारे थे खनियाधाना

सचिन मोदी ,खनियांधाना -पूरे विश्व में क्रांतिकारी संत के नाम से विख्यात तथा अपने कड़वे प्रवचनों के माध्यम से समाज को सत्य एवं सटीक दिशा देने वाले जैन मुनि तरुण सागर महाराज की 1 सितंबर को तड़के दिल्ली में समाधि हो गई । उनकी समाधि की खबर सुनते ही पूरे देश भर के जैन समाज ही नहीं बल्कि हर एक सुनने वाले के भीतर शोक की लहर दौड़ गयी । इसी क्रम में खनियाधाना के पार्श्वनाथ दिगं. जैन बड़ा मंदिर में शोक सभा का आयोजन कर उनको श्रद्धांजलि दी गई । श्रद्धांजलि सभा में मन्दिर जी में चातुर्मास कर रहे ऐलकश्री सिद्धांत सागर जी महाराज ने उनके जीवन के विषय में उद्बोधन दिया कि मुनिश्री तरुण सागर जी महाराज पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे तथा इस वर्ष दिल्ली के कृष्णा नगर इलाके में स्थित चातुर्मास स्थल राधा पुरी जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे थे । अपनी बीमारी को ठीक होते नहीं देख उन्होंने गुरु आज्ञा से समाधि लेने का निश्चय किया तथा अन्न ,  जल, औषधि आदि सब त्याग कर जैन धर्म में वर्णित समाधि के माध्यम से अपने जीवन को सफल किया क्योंकि प्रत्येक त्यागीव्रती , संयमी , साधु की यही भावना होती है कि उसका अंतिम समय समाधि पूर्वक बीते जिसको उन्होंने निभाया । इस अवसर पर खनियाधाना जैन समाज के वीरेंद्र जैन मोदी , कैलाश जैन , महेंद्र जैन , सनत जैन , पवन जैन, राजेश जैन आदि ने बताया कि खनियाधाना मैं मुनि श्री तरुण सागर जी का आगमन करीब 25 वर्ष पहले सन 1993 में  हुआ था उस समय उनके साथ मुनि श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज थे तथा दोनों महाराज जी इसी बड़े जैन मंदिर में काफी समय तक रुके थे तथा अपूर्व धर्म प्रभावना की थी । उस समय प्रतिदिन सायंकाल में जो गुरु भक्ति होती थी उस गुरु भक्ति में वह भजन बोलते थे कि
" भोले भाले भगवन मेरे , मौन लिए क्यों बैठे हो
आंख खोल कर देखो भगवन हम क्या तुम्हें चढ़ाते हैं"
वह पंक्तियाँ आज भी स्मरण हैं , ऐसी सरल वाणी हम सभी को हृदय स्पर्श करती थी ।

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