अभिषेक जैन खजुराहो-प्रवचन मे आचार्यश्री विधासागर जी महाराज ने कहा कि जब अति होती है, तो इति प्रारंभ हो जाती है। अथ का प्रारंभ हो जाता है। तिर्ययों ने भी धर्मधारण कर काय कल्प किया है। करते हैं, परंतु मनुष्य काया का दास बना है। दया का मतलब ही है यदा करो तोे दया जरुर आएगी। मूकमाटी मूक रुप से बोलती है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए नीचे देखकर चलता है, पर यदि नीचे जीवों को बचाकर चले, तो चलना सार्थक होगा।
उन्होंने मार्मिक उपदेश देते हुये कहा कि गाड़ी में ब्रेक तो है, पर ब्रीम से काम लो। आंख बंद कर चलोगे, तो एक्सीडेंट होगा ही। हमारे आर्शीवाद से आ रहे थे क्या, अनकंट्रोल यानि फास्ट चलाते हो क्या(अमित पड़रिया आदि का चार लोगों का हटा के पास एक्सीडेंट पर खरोच तक नहीं आई, जबकि नई कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है।मनुष्य होकर भी नियंत्रण विहीन है, पशु होकर भी नियंत्रण में ही चलते है। देवों की संख्या असंख्यात है, मनुष्य संख्यात ही है। उन्होंने कहा कि मनुष्य अंडर में रहना नहीं चाहता, अंडर मे रखना चाहता है, ये ही उसकी अंडर स्टेडिंग है। आचार्य श्री ने कहा
केएम गंगवाल द्वारा एक साथ गुरुपूिर्णमा को एक लाख लोगों को शाकाहार बनाना छोटा काम नहीं पर चारों ओर हाहाकार होता है, तो शाकाहार ही एक मात्र शरण है। उन्होने अमरचंद दीवान का उदहारण देते कहा अमरचंद दीवान ने शेर को खिलाई जलेबी और पिलाया दूध। भगवान केवल प्रासंगिक ही याद करने के लिए नहीं, जहां कहीं जाओ, उन्हें मत भूले, जिन्हे आदर्श माना है। शेर भी पैदा हुआ, तब छह महीने तक मां का दूध ही पीता है। मांस काे छह महीने सूघने ने भी नहीं देती। बाद में मांस खाना प्रारंभ करता है। स्वीस बैंक में पैसा रखना, राष्ट्र पर जिसे विश्वास नहीं उस पर कभी विश्वास मत करना। सुन रहे हो नरसिंहो, सिंह की कथा सुनो। शेर पीता नहीं, चम्मच की भांति लेता है। उसके लिए भी देशी घी से तैयार जलेबी चासनी युक्त है। भारतीय संस्कृति का व्यंजन है जलेबी-इंजेक्शन से चासनी नहीं भरी जाती है। अमरचंद दीवान आज भी अमर है। सिंह भी छह महीने तक दूध पीया हुआ है। वह भी माइ का लाल है, माइक का लाल नहीं। ऐसे दो लोग हुए है, जीवदयान के लिए। दिवान मत बनो, दिवान से प्रेरणा लेओ। रक्षक ही भक्षक बन रहा है, तो तुम कहां जाओगे।
परिश्रम से पसीना बाहर आ जाता है: आचार्यश्री :
परिश्रम से पसीना बाहर आ जाता है। साहित्य का निर्माण किया। सिंह वृत्ति वाले थे वे श्रावक भी। मांगते नहीं। सेवा करते थे। दीनहीन नहीं होते थे। उनका जीवन टीका हुआ है बिका हुआ नहीं है। तिर्ययों का पालन विशेषत: आर्यखंड के मनुष्य करते हैं, भू-देव यानि ब्राह्माण कहते है उन्हें। अब आंख ही नहीं राेंगटे भी खड़े नहीं क्योकि वे भी सूख गए है। कान सुनने में अक्षम हो गए है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी