*✍️ पारस जैन "पार्श्वमणि" पत्रकार कोटा*
*सम्पूर्ण विश्व वैश्विक महामारी कोरोना की मार से गुजर रहा हैं जब जब भी धरती पर पापाचार अत्याचार बढ़ता है मूक निरीह जीव जंतुओं की हत्या की जाती है उनको मोत के घाट उतार दिया जाता है जब उनकी करुण पुकार क्रदन कोई नही सुनता तो फिर प्रकृति और परमात्मा उनकी करुण पुकार सुनते हैं। फिर इस धरती पर प्राकृतिक विपदाये आती है। सबसे बडी विडम्बना है कि मानव प्रकृति को अपने अनुसार चलाना चाहता है यह ठीक नही है हमको प्रकृति के अनुसार चलना चाहिए। 22 मार्च 2020 को लॉक डॉउन हुआ था। इस कोरोना महामारी ने जन्म ,मरण , परण तीनो ही परिस्थितियों को सुधार दिया। या यों कहें कि हर विपरीत परिस्थितियों में जीना सिखा दिया। बड़े बड़े महान समाज सुधारक विचारक मृत्युभोज बन्द नही करवा पाए परंतु इस महामारी ने सब बीस से पचास जनो तक सीमित कर दिया। शादी विवाद में जो लाखो करोंड़ो फ़िजूल ख़र्च होता था वो भी बचा दिया।* *प्रकृति की कोई भी देन हो उससे हानि ओर लाभ दोनो होते है। कोरोना के कहर से सम्पूर्ण मानव जाति को कैसी भी परिस्थिति हो सादगी से जीना सिखा दिया । कितने ही आलीशान मकान गाड़ी एवम संपत्ति हो परन्तु अहंकार कदापि नही करना चाहिए।सबको मालूम है और कहा भी गया है सज धज कर जिस दिन मोत की शहजादी आएगी ना सोना काम आएगा ना चाँदी आएगी। यह दुनिया रैन बसेरा है यह दो दिन का मेला है । क्या साथ लाया था क्या साथ ले जाएगा। इस महामारी ने सभी को घर के अंदर एक दो दिन नही सप्ताह नही बल्कि कई दिनों के लिए कर दिया था। वैज्ञानिक और चिंतक विचारक चाहै कितनी भी तरक्क़ी कर ले प्रकृति एक ही झटके में उसको अपनी औकात दिखा देती है। प्रकृति के सभी जीव जन्तु बाहर थे और हम घरो के अंदर कैद थे। इस महामारी से कोरोडो का घाटा तो हुआ ही देश की अर्थव्यवस्था को भी बहुत जोरदार झटका लगा। लाखो लोगो का रोजगार चला गया।*
*धरती के भीतर भूकंप आ रहे है धरती पर वैश्विक महामारी कोरोना है आसमान पर टिड्डे छा रहें है। सीमाओ पर युद्ध की संभावनाये बढ़ रही है ।सभी धर्म आयतन भगवान के द्वार बंद है। कहते है कि विपत्ति के समय भगवान की पूजा आराधना भक्ति की जाती है परंतु यहाँ तो पूजा पाठ भक्ति के स्थान धर्म आयतन ही बन्द किये हुवे है। यह सब घटनाक्रम किस ओर इशारा कर रहा है । सोचने वाली बात यह है कि अब हम हर पल हर घड़ी अपने परिणाम निर्मल बनाये रखे। सकारात्मक सोच होनी चाहिए।एक पल एक क्षण के लिए भी किसी का बुरा नही सोचे नही विचारे। सब सुखी हो कोई दुखी नही रहे सबका कल्याण हो। यदि हम एक दूसरे के साथ रहेंगे तो यह जंग जरूर जीतेंगे।हमको प्रकृति द्वारा जो विरासते मिली है उनका खूब संवर्धन संरक्षण करना चाहिए। फिर कभी प्रकृति विकृति का रूप नही दिखाएगी । रामायण के एक प्रसंग में एक जगह जंगल मे माँ सीता जी ने लव कुश को हरे पेड़ काटने से मना किया था और हाथ जोड़ कर उनसे क्षमा माँगी थी सीता माँ ने कहा प्रकृति में जितने भी जीव जंतु मानव है सभी से प्यार करो प्रकृति में सबको अपना मानो । यह वास्तव में यह घटना "" वसुधेव कुटुम्बकम "का अमर संदेश देती है। मेने भी इस संदर्भ में दो लाइन लिखी है ।*
*इस जिंदगी का क्या भरोसा कुछ नही कह सकते है हम*
*प्यार स्नेह ममता के सिवा कुछ नही लुटा सकते है हम*
*नजर अपनी बदलो नजारे बदल जाएंगे सबको अपना मानो सब आपके हो जाएंगे।*
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