वागोल पार्श्वनाथ -बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर और कुशलगढ़ कस्बे से मात्र 7 किमी दूरी पर स्थित सघन वन क्षेत्र के बीच हिरन नदी के तट पर स्थित भगवान वागोल पार्श्वनाथ का मंदिर जिले के साथ देश भर में श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बन गया है। समाज अध्यक्ष जयंतीलाल सेठ और मंत्री हंसमुख सेठ ने बताया कि प्राचीन मान्यता के अनुसार वागोल पार्श्वनाथ मंदिर प्राचीन काल में भट्टारक सुमत कीर्ति महाराज द्वारा लाया गया है। मंदिर में कसोटी पत्थर की काले रंग की सप्तफणी पश्चिम मुखी भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है। वागोल के मूल नायक भगवान की प्रतिमा संवत 1617 इसवीं अंकित है। जिससे यह सिद्ध होता है प्रतिमा प्राचीनकाल की है।
सेठ के अनुसार श्रद्धा के इस मंदिर की कहावत तब सिद्ध हुई जब मुनिश्री प्रज्ञा सागरजी महाराज की प्रेरणा से जीर्ण शीर्ण मंदिर को नए मंदिर का निर्माण शुरू करने के लिए पुराने मंदिर को जीर्णोद्धार करने का कार्य शुरू किया तो समाज के लोगों में सहसा आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि कितने वर्षों से जिस मंदिर में भक्ति पूजा हो रही है वह मंदिर बिना पाये के खड़ा था। मंदिर के कहीं पर भी पाये नहीं मिलना अपने आप में आश्चर्य था। भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अत्यंत मनोहर एवं अतिशयकारी है। चैत्र सुदी एकम के दिन यहां पूजन व नई ध्वजा चढ़ाने का विशेष कार्यक्रम होता है। इसके अलावा रक्षा बंधन के दूसरे दिन समाज द्वारा सामूहिक रूप से पूजन व आरती भी की जाती है। श्रद्धा के इस धाम पर यहां श्रद्धा पूर्वक मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है
सेठ के अनुसार श्रद्धा के इस मंदिर की कहावत तब सिद्ध हुई जब मुनिश्री प्रज्ञा सागरजी महाराज की प्रेरणा से जीर्ण शीर्ण मंदिर को नए मंदिर का निर्माण शुरू करने के लिए पुराने मंदिर को जीर्णोद्धार करने का कार्य शुरू किया तो समाज के लोगों में सहसा आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि कितने वर्षों से जिस मंदिर में भक्ति पूजा हो रही है वह मंदिर बिना पाये के खड़ा था। मंदिर के कहीं पर भी पाये नहीं मिलना अपने आप में आश्चर्य था। भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अत्यंत मनोहर एवं अतिशयकारी है। चैत्र सुदी एकम के दिन यहां पूजन व नई ध्वजा चढ़ाने का विशेष कार्यक्रम होता है। इसके अलावा रक्षा बंधन के दूसरे दिन समाज द्वारा सामूहिक रूप से पूजन व आरती भी की जाती है। श्रद्धा के इस धाम पर यहां श्रद्धा पूर्वक मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है
संतो की तपस्थली
जिले के सबसे बड़े जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र अंदेश्वर पार्श्वनाथ के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं का वागोल अतिशय में आना होता है । इसी तरह से सघन वनक्षेत्र और मंदिर के पृष्ठभाग पर बहती हिरन नदी की जलधारा के सुंदर मनोरम स्थल को संतो की तपस्थली कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि इस अति प्राचीन प्रतिमा के दर्शन करने जैन समाज के राष्ट्रीय संतो का भी यहां आगमन हुआ है जिसमें आचार्य पुष्पदंत सागरजी महाराज, आचार्य सन्मति सागरजी महाराज, तरूण सागरजी महाराज, पुलक सागरजी महाराज के साथ कई संतो ने तीर्थ पर आकर तप साधना का श्रेष्ठ स्थान बताया।
मंदिर का जीर्णोद्धार
प्राचीन मंदिर जीर्ण शीर्ण हो जाने के कारण मुनि प्रज्ञा सागरजी महाराज की प्रेरणा से नए मंदिर का निर्माण श्री दिगंबर जैन बीस पंथी समाज कुशलगढ़ द्वारा करवाया गया है। नये मंदिर का निर्माण बंशी पहाड़ के पिंक पत्थर से निर्मित किया गया। मुख्य मंदिर के सामने 23वें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ की कमलासन पर विराजमान खड़गासन प्रतिमा की स्थापना प्रतिष्ठा समारोह में होगी। खड़गासन प्रतिमा के निचले भाग में पद्मावती व क्षेत्रपाल जी की प्रतिमा अंकित की गई है। राजस्थान के सुप्रसिद्ध शिल्पियों द्वारा मंदिर के अंदर भाग में गुंबज पर जैन धर्म संस्कृति के चित्र उकेरे गए है। साथ ही पुरे पाषाण मंदिर पर सुन्दर नक्काशी की गई है। विशेष बात यह है कि समाज के अथक प्रयास से तीन वर्ष में मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया जिसमें सकल दिगंबर जैन बीस पंथी समाज ने सहयोग प्रदान किया।
प्रतिष्ठित होने वाली 25 फीट ऊंची भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा।
5 मई से शुरू होगा प्रतिष्ठा महोत्सव
समाज के मंत्री हंसमुखलाल सेठ ने बताया कि 5 मई से पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आचार्य सुनील सागरजी महाराज सहित 50 से अधिक पिच्छियों के सान्निध्य में होगा। जिसमें भगवान के गर्भ, जन्म, तप, केवल्य और मोक्ष कल्याणक कार्यक्रम होंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
जिले के सबसे बड़े जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र अंदेश्वर पार्श्वनाथ के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं का वागोल अतिशय में आना होता है । इसी तरह से सघन वनक्षेत्र और मंदिर के पृष्ठभाग पर बहती हिरन नदी की जलधारा के सुंदर मनोरम स्थल को संतो की तपस्थली कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि इस अति प्राचीन प्रतिमा के दर्शन करने जैन समाज के राष्ट्रीय संतो का भी यहां आगमन हुआ है जिसमें आचार्य पुष्पदंत सागरजी महाराज, आचार्य सन्मति सागरजी महाराज, तरूण सागरजी महाराज, पुलक सागरजी महाराज के साथ कई संतो ने तीर्थ पर आकर तप साधना का श्रेष्ठ स्थान बताया।
मंदिर का जीर्णोद्धार
प्राचीन मंदिर जीर्ण शीर्ण हो जाने के कारण मुनि प्रज्ञा सागरजी महाराज की प्रेरणा से नए मंदिर का निर्माण श्री दिगंबर जैन बीस पंथी समाज कुशलगढ़ द्वारा करवाया गया है। नये मंदिर का निर्माण बंशी पहाड़ के पिंक पत्थर से निर्मित किया गया। मुख्य मंदिर के सामने 23वें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ की कमलासन पर विराजमान खड़गासन प्रतिमा की स्थापना प्रतिष्ठा समारोह में होगी। खड़गासन प्रतिमा के निचले भाग में पद्मावती व क्षेत्रपाल जी की प्रतिमा अंकित की गई है। राजस्थान के सुप्रसिद्ध शिल्पियों द्वारा मंदिर के अंदर भाग में गुंबज पर जैन धर्म संस्कृति के चित्र उकेरे गए है। साथ ही पुरे पाषाण मंदिर पर सुन्दर नक्काशी की गई है। विशेष बात यह है कि समाज के अथक प्रयास से तीन वर्ष में मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया जिसमें सकल दिगंबर जैन बीस पंथी समाज ने सहयोग प्रदान किया।
प्रतिष्ठित होने वाली 25 फीट ऊंची भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा।
5 मई से शुरू होगा प्रतिष्ठा महोत्सव
समाज के मंत्री हंसमुखलाल सेठ ने बताया कि 5 मई से पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आचार्य सुनील सागरजी महाराज सहित 50 से अधिक पिच्छियों के सान्निध्य में होगा। जिसमें भगवान के गर्भ, जन्म, तप, केवल्य और मोक्ष कल्याणक कार्यक्रम होंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
