भारत की मुद्रा क्रांति के नायक: डॉ. अंबेडकर ने बदली आर्थिक व्यवस्था की तस्वीर


(लेखक मोतीलाल अहिरवार)
(लेखक शिवपुरी जिले में डिप्टी कलेक्टर के रूप में पदस्थ हैं)

भारत की आधुनिक मुद्रा प्रणाली, बैंकिंग ढांचा और वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था की नींव में डॉ. भीमराव अंबेडकर की गहरी सोच और शोध का अहम योगदान रहा है। उन्होंने उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या, मुद्रा की अस्थिरता, को पहचाना और उसका स्थायी समाधान प्रस्तुत किया। मुगल काल में अकबर के दौर में सोने की मोहर और चांदी के रुपये प्रचलन में थे, लेकिन देशभर में अलग-अलग टकसालों के कारण इन सिक्कों का वजन और शुद्धता एक समान नहीं थी। लाहौर, आगरा, कंधार और दिल्ली के सिक्कों में अंतर होने से व्यापार में कठिनाइयाँ पैदा होती थीं। दक्षिण भारत में “स्टार पैगोडा” जैसी अलग मुद्रा का प्रचलन स्थिति को और जटिल बना देता था। परिणामस्वरूप, एक क्षेत्र की मुद्रा दूसरे क्षेत्र में आसानी से स्वीकार नहीं होती थी और ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली चलती रही।

द्विधातु प्रणाली यानी सोना और चांदी दोनों पर आधारित मुद्रा व्यवस्था भी सफल नहीं रही। शासकों द्वारा तय अनुपात व्यवहार में टिक नहीं पाया और लगातार उतार-चढ़ाव से व्यापार प्रभावित होता रहा। ब्रिटिश काल में भी विभिन्न प्रेसीडेंसी द्वारा अलग-अलग मानक तय किए जाने से स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इन्ही समस्याओं का गहराई से अध्ययन करते हुए डॉ. अंबेडकर ने 1923 में The Problem of the Rupee: Its Origin and Its Solution नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने भारतीय मुद्रा की अस्थिरता के कारणों और समाधान का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने सुझाव दिया कि मुद्रा नियंत्रण को सरकार से अलग रखते हुए एक स्वतंत्र संस्था के अधीन किया जाए और एक स्थिर मौद्रिक नीति अपनाई जाए।

1926 में “रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस” के सामने उनके विचार रखे गए, जिन्होंने आयोग को काफी प्रभावित किया। इसी के आधार पर भारतीय केंद्रीय बैंक की अवधारणा को आकार मिला और अंततः Reserve Bank of India की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई। डॉ. अंबेडकर का मानना था कि मुद्रा की स्थिरता किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का आधार होती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुद्रा और ऋण नियंत्रण एक स्वतंत्र संस्था के हाथ में होना चाहिए, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप से बचा जा सके। आज RBI इसी सिद्धांत पर कार्य करते हुए देश में मुद्रास्फीति, विनिमय दर और बैंकिंग प्रणाली को नियंत्रित करता है।

इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के लिए अलग बैंकिंग व्यवस्था की आवश्यकता भी बताई, जो आगे चलकर ग्रामीण बैंकों और कृषि ऋण प्रणाली के रूप में विकसित हुई। उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि आज भारत में एकीकृत मुद्रा प्रणाली लागू है, जहां एक ही रुपया पूरे देश में मान्य है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी डॉ. अंबेडकर को अपना “वैचारिक जनक” माना है। उनके योगदान को सम्मान देते हुए उनके 125वें जन्मदिवस पर 125 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया गया। आज जब भारत की मजबूत बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली की बात होती है, तो यह स्पष्ट होता है कि इसकी आधारशिला डॉ. भीमराव अंबेडकर की दूरदर्शी सोच और आर्थिक समझ पर ही टिकी हुई है।

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