स्म्रति के झरोखे से श्री अटल बिहारी वाजपेयी तृतीय पुण्यतिथि पर उनसे जुड़ी स्म्रति

भारतीय जनता पार्टी के लोह पुरुष 'मुख्य स्तंभ' पार्टी की रीढ़' एक मजबूत कड़ी जिन्होंने पार्टी की एकता और अखंडता को कभी भी छिन्न भिन्न नही होने दिया स्वभाव से बड़े ही नम्र दिल और सेवा भावी थे उनकी विनम्रता का एक किस्सा बड़ा ही रोचक है जो आज उनके मरणोपरांत अचानक याद आ गया।
श्रावणमास की 25 अगस्त सन 1999 का दिन था आचार्य विद्यासागर जी महाराज इंदौर के पास गोमट गिरी में विराजमान थे माननीय अटल जी उस समय प्रधानमंत्री पद पर आरूढ़  थे उन्होंने आचार्य भगवंत के दर्शनों को जाने का मन बनाया और अपने शासकीय प्रोग्राम के तहत गोमटगिरी दर्शन और चर्चा करने के लिये निकल पड़े।
 चूंकि प्रोटोकाल के तहत स्थान और समय निश्चित कर दिया गया था लेकिन किसी कारणवश अटल जी को पहुचने में देरी हो गयी और आचार्य भगवन अपनी नित्य चर्या के अनुसार उस कक्ष से हटकर दूसरी जगह जा कर बैठ गए जहां मुलाकात तय की गई थी।
जैसे ही अटल जी गोमटगिरी पहुचे उनके साथ पहुचने वाले अधिकारियों ने निश्चित स्थान पर पहुचने की बात की तब संघ के साधुओ ने असमर्थता जताते हुए कहा कि अब आचार्य श्री वापिस कैसे आएंगे उनके अन्य कार्यो का समय निश्चित हैं।
जैसे ही अटल जी के कानों तक यह बात पहुची उन्होंने बड़ी ही सरलता से कहा में तो पूज्यनीय संत के दर्शन करने आया हु और में ही उनके पास जाऊंगा  और ऐसा कहते हुए सभी प्रोटोकॉल को छोड़ वे आचार्य भगवंत के पास तक गए उनके चरणों को छूकर आशीर्वाद लिया और काफी देर तक रुक कर तत्व चर्चा की देश हित के बारे में भी बात की ।
  संकलित अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी

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