वस्त्र ऐसा धारण करें जिससे शील को कलंक न लगे : अर्हमश्री माताजी

बांसवाडा-बाहुबली कॉलोनी में बिराजित आर्यिका रत्न अर्हमश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जीवन में सुख और दु:ख दोनों आते जाते हैं। लेकिन हमें इससे घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इंसान के जीवन में सुख भी आते हैं और दु:ख भी आते हैं। कभी-कभी होते हुए काम भी बिगड़ जाते हैं। जब आदमी को सफलता मिलती है और आगे की ओर बढ़ता है, तो लोग कहते हैं देखो कितना खुश किस्मत है। अगर असफलता मिले और विफल हो जाए तो कहते हैं कितना बदकिस्मत आदमी है। यह दुनिया है जाे दोनों तरफ बोलती है। मगर इंसान वही है, जो उसकी सफलता में साथ न दे कर उसकी बदकिस्मती में उनकी सेवा करे। जो अभाव में ग्रसित है उनकी और सहायता के हाथ बढ़ाना चाहिए। इंसान कितना भी कठोर हो, तेज हो मगर अंदर से मुलायम और मीठा ही रहता है। फर्क बस इतना है कि उसे हमें समझना पड़ता है। जैसे नारियल उपर से नरम होता है फिर कठोर उसके बाद फिर नरम व मीठा अपने स्वभाव में आ जाएगा। इस तरह संस्कार देना कि अगर कोई मुनि तुम्हारे नगर मे आए तो आहार जरूर देना और  वस्त्र तो धारण करना मगर एसा करना कि सिर से लेकर पूरा शरीर ढक जाए। इससे तुम्हारे शील में कोई कलंक नहीं लगे। प्रवचन मात्र आपके लिए ही नही आपके बच्चो एवं परिवार के लिए है।  यह जानकारी चातुर्मास कमेटी के प्रवक्ता महेंद्र कवालिया ने दी।
                संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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