माता-पिता से बर्तन मंजवाने वाला वयस्क पुत्र होता है पाप का भागी -मुनि श्री सुधासागर

अभिषेक जैन लुहाडिया आवा-श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र आवां में चल रहे चातुर्मास में मुनि पुंगव 108 श्री सुधा सागर जी महाराज ने मंगलवार सुबह प्रवचनों में कहा कि जो इंसान वयस्क होने पर भी माता-पिता से झूठे बर्तन मंजवाता है। नहाने-धोने एवं पीने के लिए पानी भरवाता है वो पाप का भागी होता है, उसे कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है।
महाराज श्री  ने कहा कि कृत्य ऐसा करना चाहिए जिससे माता-पिता, परिवार, समाज और देश का नाम हो। बैर,पाप और अभिमान को छोड़ना चाहिए। संपत्ति के लिए भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है। अहिंसा धर्म के पालन के लिए जैन साधु वर्षायोग करते हैं। इसका मकसद श्रद्धालुओं में आध्यात्मिक जागरण व श्रद्धा को लाना है। श्रावक 4 माह अहंकार, दुराग्रह को छोड़कर सरलता धारण करे। यह विचार संत श्री सुधा सागर जी ने मंगल प्रवचनों में व्यक्त किए।
मां-बाप की सेवा करना ही धर्म
माता-पिता की सेवा करना धर्म है। चाहे वह किसी भी हिसाब से हो। सेवा करना हमारा धर्म है और जितना हमारे धर्म का पालन करेंगे, उतना सुख हमें मिलेगा। बुजुर्गों की सेवा तो होती है।साथ-साथ सुख भी होता है। मां-बाप को सुख दे तो हमें सुख मिलता है।
चातुर्मास स्वयं को जानने का अवसर
मुनि सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि चातुर्मास स्वयं को जानने तथा अन्य जीवों की प्राण रक्षा का अवसर है। चातुर्मास पर्व यानि चार माह का तप, साधना,भक्ति और पूजा का आयोजन है। तपस्या का फल शाश्वत सुख है। तप से आत्मा शुद्ध होती है। जिस प्रकार अग्नि से स्वर्ण शुद्ध होता है। प्रिय एवं सत्य भाषा का प्रयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन्द्रिय और मन को बस में करना तप है। जहां नित देव पूजाएं गुरु की वंदना की जाती है। वह स्थान स्वर्ग तुल्य है। गुरु की समीपता से मोहरुपी अंधकार नष्ट होता है।

जैसा बोता है, वैसी ही फसल काटता है- मुनि श्री ने कहा कि देवी-देवता भी किसी व्यक्ति की पूजा-उपासना तभी स्वीकार करते हैं जब वह अपने घर में मौजूद देवी-देवता यानी मां-बाप की सेवा करता है। मां-बाप की उपेक्षा करने वालों के लिए तीर्थस्थलों की खाक छानने का कोई अर्थ नहीं है। दुर्भाग्य से अब यही हो रहा है। लोग यह भूल जा रहे हैं कि मां-बाप कितने कष्ट उठाकर बच्चों का पालन-पोषण करते हैं।
  

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