कलिंजरा-मुनि श्री समता सागरजी महाराज ने धर्म की प्रभावना का उद्देश्य बताते हुए कहा कि साधना उस समय तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक भगवान के आगे सच्चे मन से निर्विकार भावना से की जाए तब जाकर श्रद्धा की भावना पूरी मानी जाती है। मुनिश्री ने कहा कि जीवन में एकजुटता की नितांत आवश्यकता है। समाज हितोपदेशपरी है, भगवान की भक्ति, समाज के उत्थान के लिए एकजुट होना परम आवश्यक हैं। एकतारूपी सूत्र का मंत्र बड़ा ही मनोहारी होता है। इस प्रकार के महाविधान से आयोजनकर्ता, समाजजन और श्रद्धालु़ओं के धनरूपी आत्मानुभूति का लाभ प्राप्त होता है।
संकलन अभिषेकजैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
संकलन अभिषेकजैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
