आत्मविश्वास से मंज़िल प्राप्त होती है पूर्णमति माताजी



बंडा-आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी ने कहा जब तक स्व को समझोगे नही तो उसमें स्थिर कैसे हो पाओगे। पर- घर में तो रहते रहते अन्तकाल व्यतीत हुआ तभी तो आज तक स्वस्थ्य निरोग दशा प्राप्त नही हुई। उन्होंने कहाँ देह मे रहना बुरी बात नही लेकिन देह दृष्टि रखना बुरा है।
  जब तक प्रथम भूमिका मे द्रष्टि को स्वसन्मुख नही किया तो द्वितीय भूमिका मे स्व का ज्ञान कैसे होगा। उन्होंने कहा ढूंढो कोई ऐसे वैद्य को जो तुम्हें निरोग कर सके, जिसे तुम अपना सर्वस्व अर्पण कर सको।
   निश्चित होकर अपनी व्यथा कथा कहा सको। तुम्हारी नज़र में यदि है तो अब विलम्ब क्यो। और हा यदि तुमने सब कुछ सोप दिया है तो निकट भविष्य तुम्हारा पूर्ण रूप से स्वास्थ्य दशा की और हो यह विश्वास करो। इसमे आत्मविश्वास बहुत मायने रखता है, इससे सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। जिससे वर्तमान सुखद होता है और जिससे वर्तमान सुखद होता है और जिसका वर्तमान सुखद हो उसका भावी भी सुखद ही होगा आर्यिका श्री ने कहा कि विशेष बात है की इसकी औषधि भी तुझमे मे ही है। इस औषध को मुख से निगला नही जाता मात्र द्रष्टि से, ज्ञान से संवेदन किया जाता है।
आर्यिका माताजी ने कहा अपने आप मे सदा स्वस्थ्य रहने वाले मेरे परम वैद्य गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज कहते है, साथ ही आह्नानन करते है- 'आओ चेतन आपे मे आओ और शाश्वत काल तक स्वस्थ्य हो जाओ।
  संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमण्डी

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