दुर्ग-हमारे जीवन जीने का कोई एक लक्ष्य जरूर होना चाहिए। बिना लक्ष्य के जीवन में सिर्फ भटकाव आता है। हम बाहर से संपन्न तो हो जाते हैं पर कोई लक्ष्य न होने के कारण भीतर से खोखले ही बने रहते हैं। हमारे पास बाह्य जगत का वैभव तो बहुत है पर जब अपने भीतर झांकते हैं तो बस शून्यता का ही अनुभव होता है। उसे भरने के लिए व्यक्ति बाहर की ओर दौड़ता है।
यह बातें सुमतिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में चल रहे ग्रीष्मकालीन वाचना में श्रमणाचार्य विमर्श सागर जी महाराज ने कहीं। उन्होंने कहा कि इंद्रीय विषयों और भौतिक साधनों की ओर लगातार भागता रहता है, लेकिन अंतरंग की सुन्नता कभी पूरी नहीं होती। अंतरंग की शून्यता को पूर्ण करने के लिए सार्थक चिंतन चाहिए। अंतरंग की शून्यता बाहर के वैभव से नहीं अंतरंग के सम्यक् विचारों से पूर्ण होती है। आचार्य ने कहा कि जीवन में दुगुर्णों को छोड़कर अच्छे गुणों को ग्रहण करना ही आर्ट ऑफ लाइफ है। हर इंसान को इसे अपनाना चाहिए।
यह बातें सुमतिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में चल रहे ग्रीष्मकालीन वाचना में श्रमणाचार्य विमर्श सागर जी महाराज ने कहीं। उन्होंने कहा कि इंद्रीय विषयों और भौतिक साधनों की ओर लगातार भागता रहता है, लेकिन अंतरंग की सुन्नता कभी पूरी नहीं होती। अंतरंग की शून्यता को पूर्ण करने के लिए सार्थक चिंतन चाहिए। अंतरंग की शून्यता बाहर के वैभव से नहीं अंतरंग के सम्यक् विचारों से पूर्ण होती है। आचार्य ने कहा कि जीवन में दुगुर्णों को छोड़कर अच्छे गुणों को ग्रहण करना ही आर्ट ऑफ लाइफ है। हर इंसान को इसे अपनाना चाहिए।
दुर्गंध को छोड़ सुंगध को स्वीकारना ही है कला
धर्मसभा में उन्होने कहा कि सुगंध और दुर्गंध दोनों ही पार्ट ऑफ लाइफ हैं। दुर्गंध को छोड़कर मात्र सुगंध को स्वीकारना यह आर्ट ऑफ लाइफ है। सभी के जीवन में कुछ गुण रूपी सुगंध होते है, तो कुछ दुर्गुण रूपी दुर्गंध भी। हमें क्या चुनना है, यह हमारे चिंतन पर निर्भर करता है। हमारा जैसा चिंतन होगा, वैसा ही हमें अनुभव होगा। आप जैसा निर्णय करेंगे, वैसा ही प्राप्त होगा। हमारे चिंतन के अनुरूप ही हमारी मनोवृत्ति होती है। इसलिए इस पर गंभीर बनें।
जैसी हमारी मनोवृत्ति वैसा ही अनुभव होने लगता है
एक क्लास में टीचर ने विद्यार्थियों को खाली शीशी दिखाते हुए कहा कि उसमें गुलाब की खुशबू आती है। टीचर के कहने पर सभी छात्रों की मनोवृत्ति वैसी ही हो गई और सभी ने शीशी को सूंघा और कहा कि इसमें भी गुलाब की सुगंध आ रही है पर एक छात्र ने कहा सर इसमें से कोई सुगंध नहीं आ रही। फिर सभी छात्र यही कहने लगे। सच यही था कि उसमें कुछ भी सुगंध नहीं आ रही थी। इसलिए जैसी हमारी मनोवृत्ति हो जाती है हमें वैसा ही अनुभव होने लगता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
धर्मसभा में उन्होने कहा कि सुगंध और दुर्गंध दोनों ही पार्ट ऑफ लाइफ हैं। दुर्गंध को छोड़कर मात्र सुगंध को स्वीकारना यह आर्ट ऑफ लाइफ है। सभी के जीवन में कुछ गुण रूपी सुगंध होते है, तो कुछ दुर्गुण रूपी दुर्गंध भी। हमें क्या चुनना है, यह हमारे चिंतन पर निर्भर करता है। हमारा जैसा चिंतन होगा, वैसा ही हमें अनुभव होगा। आप जैसा निर्णय करेंगे, वैसा ही प्राप्त होगा। हमारे चिंतन के अनुरूप ही हमारी मनोवृत्ति होती है। इसलिए इस पर गंभीर बनें।
जैसी हमारी मनोवृत्ति वैसा ही अनुभव होने लगता है
एक क्लास में टीचर ने विद्यार्थियों को खाली शीशी दिखाते हुए कहा कि उसमें गुलाब की खुशबू आती है। टीचर के कहने पर सभी छात्रों की मनोवृत्ति वैसी ही हो गई और सभी ने शीशी को सूंघा और कहा कि इसमें भी गुलाब की सुगंध आ रही है पर एक छात्र ने कहा सर इसमें से कोई सुगंध नहीं आ रही। फिर सभी छात्र यही कहने लगे। सच यही था कि उसमें कुछ भी सुगंध नहीं आ रही थी। इसलिए जैसी हमारी मनोवृत्ति हो जाती है हमें वैसा ही अनुभव होने लगता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
