अंदेश्वर -अतिशय सिद्ध क्षेत्र अंदेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर में चातुर्मासरत चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य सुनील सागरजी ने प्रवचन शृंखला के तहत रविवार काे कहा कि चेहरे की सुंदरता आंखों में उतरती है और स्वभाव की सुंदरता दिल में उतरती है। आज लोग तन की सुंदरता पर माेहित जाते हैं। शरीर की सुंदरता पर लुभाने की आवश्यकता नहीं है। संसारियों की सबसे बड़ी भूल यही है कि सुंदरता पर रीस जाते हैं। इसके पीछे अपने शील की भी सुरक्षा नहीं कर पाते है। स्वभाव की सुंदरता वाले लोग हृदय में वास करने है। शरीर मैला होता है, तन असुंदर दिखता है फिर भी मन की पवित्रता कौन नाप सकता है ...? जो संसार में कोई नहीं सिखाता वह संस्कार दिगंबर - वीतराग गुरु सिखाते हैं। जहां देह अपना नहीं वहां अपना काैन हो सकता है। यह संसार एक महासागर है, इस संसाररूपी सागर में मोहरूपी मगरमच्छ के मुख से कौन बच सकता है। इस सागर में जन्म-मरण रूपी तरंगे हिलाैरे ले रही है। सागर के खारे जल को पीकर तृप्ति को प्राप्त होता है। उसी तरह संसार के भोग से तृप्ति नहीं हो सकती। युवाओं। वह जीव, वह संत महात्मन धन्य है जिन्होंने इस भोगरूपी जल को पीने की चेष्टा ही नहीं की। वे तो मन से, स्वभाव से इतने सुंदर है कि उनकी सुंदरता दिल में उतरती हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
