जौरा : यह विधानसभा सीट, ब्राह्मण, राजपूत और ओबीसी बाहुल्य क्षेत्र है । यहां अनुसूचित जाति के मतदाता भी बड़ी तादाद में है । अनुसूचित जाति की अच्छी खासी संख्या है, ओबीसी में कुशवाह और धाकड मतदाताओं की संख्या भी अधिक है । यानी जौरा में चार प्रमुख जातियां ब्राह्मण, राजपूत ओबीसी और अनुसूचित जाति के मतदाताओं का दबदबा है । इसके अलावा यादव, वैश्य, नाई, नट और आदिवासी भी निर्णायक भूमिका में हैं । जौरा विधानसभा के इतिहास में कांग्रेस और बसपा को तो जीत मिलती रही है लेकिन बीजेपी को केवल एक बार जीत नसीब हुई है 2013 के विधानसभा चुनाव में, हालांकि 2018 में जीते बनवारी लाल शर्मा के निधन के बाद एक बार फिर जौरा सीट पर भाजपा का कब्जा है, यहां जातियों का ऐसा जाल फैला है कि कब किसके पक्ष में जबरदस्त समर्थन उमड़ पड़े कहा नहीं जा सकता है ।
जौरा विधानसभा की जमीनी राजनीति पर बारीकी से नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जौरा में किसी राजनीतिक पार्टी पर नहीं बल्कि उम्मीदवार की विश्वसनीयता पर वोट पड़ता है,. हालांकि यह भी देखा गया है कि राजपूत, ब्राह्मण और ओबीसी मतदाताओ का अपनी जाति के उम्मीदवार के प्रति झुकाव होता है, तब निर्णायक की भूमिका में अनुसूचित जाति और ओबीसी की अन्य उपजातियां होतीं हैं । जौरा विधानसभा में यूं तो लगभग हर जाति का अच्छा खासा वोट बैंक है लेकिन चुनावी मैदान में राजपूत, ब्राह्मण और ओबीसी मतदाता ही दिखाई देते है, अपने उम्मीदवारों के लिये राजपूत और ब्राह्मण मतदाता बंट जाते है ऐसा ही ओबीसी की उस जाति में भी देखने को मिलता है जहां उनकी जाति का उम्मीदवार मैदान में हो । जौरा विधानसभा क्षेत्र में ओबीसी की कई जातियां हैं जिनमें कुशवाह, धाकड, यादव और नाई प्रमुख है. धाकड़ समाज से बसपा ने मनीराम धाकड पर कई बार दांव लगाया है जिसमें से 2008 में मनीराम धाकड ने जीत भी दर्ज की है । जौरा विधानसभा में अनुसूचित जाति निर्णायक भूमिका में है । वैसे तो इनका झुकाव बसपा की ही तरफ रहता है लेकिन उम्मीदवार के नाम पर भी यह वोट डालते हैं ।
