आगरा - मनुष्य जन्म से ही मान का पुतला है। उसके मान की पूर्ति नही होती तो सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। मूछ और पूछ की लड़ाई में व्यक्ति लगा रहता है। रावण को भी पता था कि वह श्रीराम से हार जाएगा, फिर भी झुकने के बजाय स्वयम को नष्ट करने के लिए तैयार हो गया।
छीपीटोला जिन मंदिर में अपने प्रवचन में मुनि श्री वीर सागर जी महाराज ने कहा जीवन पर व्यक्ति ज्ञान दर्शन होते हुए भी विभाव में जीता रहता है। विभाव को स्वभाव बना लेता है। मान कषाय स्वयम को डुबोती है और दूसरों को भी डुबोती है। जो जीवित रहता है, वही झुकता है। अकड़ना मुर्दे की शान है, इसीलिए मन से झुकना सीखो। जल जीवन देता है, हिम जीवन लेता है। मान सबसे खतरनाक है। नाम से ही मान की शुरुआत होती है। जब हम मान कषाय से भर जाते है तो अपने को भी खो देते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी
