सत्य वह जो शाश्वत के सिंहासन पर विराजमान है : ऋजुमति माताजी

खुरई-पर्वराज पर्यूषण पर मंदिराें में पूजा, अर्चना चल रही है। श्रद्धालु व्रत, उपवास कर रहे हैं। दाेपहर में प्राचीन मंदिर में आर्यिका संघ के सानिध्य में तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया जा रहा है। प्राचीन जैन मंदिर में आर्यिकारत्न ऋजुमति माताजी ने ‘उत्तम सत्य धर्म’ पर प्रवचन देते हुए कहा कि अहिंसा के साथ सत्य जीवन में एक प्रकाश की तरह है, जो स्वयं प्रकाशित होकर इसके साए में रहने वाले को भी प्रकाशित करता है। सत्य एक सजग प्रहरी की तरह है, जो हमारे जीवन के मैदान में अडिग रहकर जीवन में बुराईयों को अपने पास नहीं आने देता है। मनुष्य अपने स्वरूप पर दृष्टि करता है, तो सत्य स्वरूप को पाता है। जब अपने आप से विमुख होता है तो सत्य स्वरूप से विमुख हो जाता है। सत्य तो आत्मा का श्रृंगार है, उसे जिसने अपना बनाया, शाश्वत स्वरूप की प्राप्ति कर ही लेता है। सत्य की महिमा को लिखा नहीं जा सकता, उसका तो अनुभव किया जाता है। यदि हम सत्य कहने जाते है, तो हो सकता है वह किसी को अच्छा नहीं लगने के कारण असत्य-सा हो सकता है, परन्तु सत्य कभी असत्य नहीं होता है। महापुरूषों ने इस सत्य के मार्ग को अपनाया कि उनकी नीति रहती थी जो सत्य है वह मेरा हैै। जो मेरा है वह सत्य है ऐसा उनका विचार नहीं था। उन्हाेंने कहा कि सत्य वह जो शाश्वत के सिंहासन पर विराजमान रहता है, लेकिन असत्य हमेशा व्यक्तियों की पगतली बन कर धूल-धूसरित होता रहा है। सत्य की अनुभूति का नाम ही धर्म है। उन्हाेंने कहा कि , जिसे सत्य की रोशनी प्राप्त हो गई, उस व्यक्ति के जीवन में असत्य का अंधकार पलक ही नहीं झपका सकता। असत्य के अंधकार को मिटाने वाला या यों कहो कि असत्य के तम को हरने वाला सत्य है।
                          संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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