बंडा-आत्म बोध शिविर के अंतर्गत स्वर कोकिला आर्यीका श्री पूर्णमति माताजी ने कहा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की मनुष्य अपने अज्ञान और मोह के कारण अपने आत्म स्वरूप को भूलकर सांसरिक सुख यानि शारीरिक सुख की सामग्री पर तीव्र राग भाव रखता है शरीर के प्रति तीव्र राग भाव के कारण ही व्यक्ति सब कुछ छोडने को तैयार हो जाता है
आर्यिका माताजी ने कहा शरीर मे यदि डायबटीज़ हो जाये तो डॉक्टर की सलाह पर सब मीठे का त्याग कर देता है हार्ट की बीमारी हो गयी तो गरिष्ठ भोजन घी आदि सब छोड देता है पाचन क्रिया बिगड़ जाये तो रुचिकर नमकीन तली आदि वस्तुये सब छोड़ देता है शरीर की अस्वस्थता निवारण के लिये व कड़वी गोली भी ले लेता है और रूखा सूखा भोजन बड़े चाव से खा लेगा पर कोई तप करने को तैयार नहीं होगा शरीर के प्रति तीव्र राग भाव के कारण ही मनुष्य शरीर की स्वस्थ्यता के लिये मनुष्य अपने पसीने की कमाई बहाने को तत्पर हो जाता है सो पचास का कभी दान भी नहीं करने वाला व्यक्ति किसी भी गंभीरी बीमारी के लिये लाखो खर्च करने को तैयार हो जाता है शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिये हम सब कुछ करने को तत्पर हो जाते है पर दान धर्म के लिये नहीं
भाव भीने उद्गार प्रगट करते कहा आत्म स्वरूप के प्रति अज्ञान के कारण ही शरीर के ही रक्षण पालन पोषण सवर्धन के लिये जीवात्मा ने सभी पापाचरण किये है अन्य सभी वस्तुओ का त्याग करना तो सरल है मगर शरीर की ममता का त्याग करना अत्यंत कठिन कार्य है लेकिन शरीर से जब ममता घट जाती है तो सच्ची अध्यात्मिकता जाग्रत होती है ऐसे अध्यात्मिक वीर को मर्त्यु का भय नहीं रहता
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
आर्यिका माताजी ने कहा शरीर मे यदि डायबटीज़ हो जाये तो डॉक्टर की सलाह पर सब मीठे का त्याग कर देता है हार्ट की बीमारी हो गयी तो गरिष्ठ भोजन घी आदि सब छोड देता है पाचन क्रिया बिगड़ जाये तो रुचिकर नमकीन तली आदि वस्तुये सब छोड़ देता है शरीर की अस्वस्थता निवारण के लिये व कड़वी गोली भी ले लेता है और रूखा सूखा भोजन बड़े चाव से खा लेगा पर कोई तप करने को तैयार नहीं होगा शरीर के प्रति तीव्र राग भाव के कारण ही मनुष्य शरीर की स्वस्थ्यता के लिये मनुष्य अपने पसीने की कमाई बहाने को तत्पर हो जाता है सो पचास का कभी दान भी नहीं करने वाला व्यक्ति किसी भी गंभीरी बीमारी के लिये लाखो खर्च करने को तैयार हो जाता है शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिये हम सब कुछ करने को तत्पर हो जाते है पर दान धर्म के लिये नहीं
भाव भीने उद्गार प्रगट करते कहा आत्म स्वरूप के प्रति अज्ञान के कारण ही शरीर के ही रक्षण पालन पोषण सवर्धन के लिये जीवात्मा ने सभी पापाचरण किये है अन्य सभी वस्तुओ का त्याग करना तो सरल है मगर शरीर की ममता का त्याग करना अत्यंत कठिन कार्य है लेकिन शरीर से जब ममता घट जाती है तो सच्ची अध्यात्मिकता जाग्रत होती है ऐसे अध्यात्मिक वीर को मर्त्यु का भय नहीं रहता
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
