जबलपुर -विश्व वंदनीय आचार्य श्री विधासागर जी महाराज ने कहा बहुत दिनों के बाद दादाजी की गोद में बैठने का एक नाती पोता को सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा उस दृश्य को ध्यान कीजिए। वह पोता भी दादा की भांति बात करता है। संसारी प्राणी नया भले हो पर पुराना संसारी होता है। छोटा कहलाता है पर छोटा होता नही। उसे अनंत काल का अनुभव होता है, संस्कार होते है।
भाव भीने उदगार प्रगट करते हुए आचार्य श्री ने कहा इष्ट की प्राप्ति करे यही साधना है। पोते का प्यार दादा को बाँध लेता है। पोता जिद करता है तो दादा को मानना पड़ता है। पोता कही सवाल करता है, दादा उत्तर देते है। कही जा रहे हो तो पोता बार - बार पूछता है कि अभी कितनी दूर है? दादा को कहना पड़ता है कि आ ही गया अब। पोता कहता है कि जब वो आ ही रहा है, तो क्यो न हम ठहर जाए। यह हास्य विनोद है। अब दादाजी क्या उत्तर देगे?
मोक्षमार्ग भी ऐसा ही
साधक लोग सुरक्षा कवच के साथ चलते है। मोक्षमार्ग ऐसा ही है। सामयिक बैठ सकते हैं। यहां भी यही प्रश्न उठता है कि कब उठोगे?दो बजता ही नही है। वही दादा पोती वाली स्तिथि बन जाती है। महाराज जी के पास फस से जाते है। हमारे पास अविश्वास का कोई काम नही है। लेकिन यह विश्वास प्रत्येक को प्राप्त होता ही नही है। श्रम स्वयं को करना होता है उसका नाम श्रमण होता है। शयन करने वाले चूक जाते है। जाग्रत ही प्राप्त करते है। यह तो शरण मार्ग है। संयम बहुत आवश्यक होता है। जीवन के अंतिम श्वास तक चलता रहता है। दीर्घकाल तक साधना रखनी होती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमण्डी
भाव भीने उदगार प्रगट करते हुए आचार्य श्री ने कहा इष्ट की प्राप्ति करे यही साधना है। पोते का प्यार दादा को बाँध लेता है। पोता जिद करता है तो दादा को मानना पड़ता है। पोता कही सवाल करता है, दादा उत्तर देते है। कही जा रहे हो तो पोता बार - बार पूछता है कि अभी कितनी दूर है? दादा को कहना पड़ता है कि आ ही गया अब। पोता कहता है कि जब वो आ ही रहा है, तो क्यो न हम ठहर जाए। यह हास्य विनोद है। अब दादाजी क्या उत्तर देगे?
मोक्षमार्ग भी ऐसा ही
साधक लोग सुरक्षा कवच के साथ चलते है। मोक्षमार्ग ऐसा ही है। सामयिक बैठ सकते हैं। यहां भी यही प्रश्न उठता है कि कब उठोगे?दो बजता ही नही है। वही दादा पोती वाली स्तिथि बन जाती है। महाराज जी के पास फस से जाते है। हमारे पास अविश्वास का कोई काम नही है। लेकिन यह विश्वास प्रत्येक को प्राप्त होता ही नही है। श्रम स्वयं को करना होता है उसका नाम श्रमण होता है। शयन करने वाले चूक जाते है। जाग्रत ही प्राप्त करते है। यह तो शरण मार्ग है। संयम बहुत आवश्यक होता है। जीवन के अंतिम श्वास तक चलता रहता है। दीर्घकाल तक साधना रखनी होती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमण्डी
