सरवाड-कस्बे में दिगंबर जैन मंदिर में विराजित विज्ञाश्री माताजी ने शुक्रवार को अपने हाथों से केशलोच किए। माताजी ने बताया कि जैन साधु-साध्वी संयम की रक्षा करने के लिए अहिंसा धर्म का पालन करने के लिए अपने हाथों से केशलोच करते हैं। संयम की रक्षा करने के लिए अहिंसा धर्म का पालन जरूरी है। माताजी ने कहा कि जैन धर्म का सबसे बड़ा सिद्धांत अहिंसा है, जिस व्यक्ति के दिल में अहिंसा होती है उस व्यक्ति के दिल में भगवान का निवास स्वत: ही हो जाता है। आज लोग छोटी-छोटी बातों पर भी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। इसलिए हमें ऐसी घटनाओं से बचने के लिए 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों को धारण करना होगा। माताजी ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी का संदेश जियो और जीने दो का नारा और उद्घोष अपने तन-मन में धारण हम इस हिंसा के मार्ग को छोड़ अहिंसा के मार्ग की ओर अग्रेषित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रकार जब तक व्यक्ति के जीवन में अहिंसा है तब तक उसका जीवन चंगा है जिस दिन जीवन से अहिंसा चली जाएगी उस दिन हमारा जीवन भी खाली हो जाएगा। इसलिए हमें हिंसा को छोड़कर अहिंसा का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। इसी संदर्भ में माताजी ने समाज के सभी के लोगों को इस बात का संकल्प दिलाया कि हम सभी को अहिंसा का मार्ग अपनाकर जैन धर्म की महिमा को अपने जन्म जन्मांतर तक निभाना है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
