मंगलाचरण के लिये ध्वजा का लहराना आवश्यक आचार्य श्री



जबलपुर -विश्व वंदनीय आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज ने कहा आप जो लोग ध्वजारोहण करते है वह मांगलिक कार्य माना जाता है। ध्वजा आपने किस लिये बनाई तो बताया जाता है कपड़े की। कपडे की यदि है तो ज्यो ही आपने रस्सी खीची तो नीचे की और आ जाता है। स्तब्ध हो जाता है निष्पंद् हो जाता है, जो गतिविधि क्रियाये नही रहती और आपका मंगलाचरण हो जाता है। किंतु हम चाहते है की उसमे गतिविधि हो, लेकिन गतिविधि के लिये सांस आवश्यक है। उसके पैर तो लगे नही है,हाथ तो नही, उसमें कुछ फड़फड़ करता है, तो सवाल उठता है कैसे? इसे मंगलाचरण कैसे कहे? वस्तुतः ध्वजदंड तो स्तब्ध होता ही है और जब ध्वजा भी वैसी ही हो तो उत्साह कैसे आयेगा? जब तक लहराये न मंगलावरण नही माना जायेगा। सरोवर है आकाश, तो उसमे लहराने के लिये भाव चाहिए।
   आचार्य भगवन ने कहा उन्होंने कहा वायु तो होती है तो किंतु गति के लिये क्रियाओं के लिये इतना पर्याप्त नही है। जैसे जैसै गर्मी पड़ती है वैसे वैसे प्राण वायु का अनुपात कम होता है। लोग कहते है बाहर तो चलो। लोग कहते है बाहर तो अधिक कमी है वायु की, धूप अधिक है। ऐसे मे प्रक्रति का महत्व समझ में आता है। लोग छत पर जाते है, ऊपर जाने पर और कमी महसूस होने लगती है ऑक्सीजन की। फिर कैसे राहत मिले?क्रत्रिम प्राण वायु ले आओ, वेंटिलेटर ले आओ, पर वह भी ठीक से काम नही आता। हम सबको चाहिए कि वातावरण को संतुलित रखने मे अपना योगदान दे। वायु के बिना पेट में भी स्पंदन नही होगा, ध्वजा तो मंगलाचरण के रूप में स्वीकार पर मंगलाचरण हुआ नही।
  संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमण्डी

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