दुर्ग-सुमतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, दुर्ग में चल रहे ग्रीष्मकालीन वाचना में श्रमणाचार्य विमर्श सागर जी महाराज ने कहा कि एक गृहस्थ अपना परिवार चलाने के लिए कई प्रकार के उद्यम करता है।
हिंसा, झूठ, चोरी आदि के माध्यम से जाने अनजाने में अनेक प्रकार के पाप कर्मों का संचय करता रहता है और अपनी आत्मा को सतत मलिन करता रहता है। उस आत्मा को पवित्र करने का उपाय सिर्फ परमात्मा के दर पर ही मिलता है। जन्म लेकर मर जाना तो सब की किस्मत में लिखा होता है पर जन्म लेकर अपने जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ करने वाले बिरले ही जीव होते हैं।
हिंसा, झूठ, चोरी आदि के माध्यम से जाने अनजाने में अनेक प्रकार के पाप कर्मों का संचय करता रहता है और अपनी आत्मा को सतत मलिन करता रहता है। उस आत्मा को पवित्र करने का उपाय सिर्फ परमात्मा के दर पर ही मिलता है। जन्म लेकर मर जाना तो सब की किस्मत में लिखा होता है पर जन्म लेकर अपने जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ करने वाले बिरले ही जीव होते हैं।
प्रभु के गुणगान से पापकर्म के बंधन ढीले पड़़ जाते है
जब कोई गृहस्थ भगवान की पूजा करने उनके समक्ष पहुंचता है, तो भगवान जैसा बनने के भाव उसके अंतरंग में पैदा होने लगते हैं। हमारे चित्त की यह विशेषता है कि हम जैसा देखते है जैसा सोचते हैं। हमारा चित्त उसी अनुरूप परिणमित होने लगता है। प्रभु के पास आते ही पुण्य वृद्धि को प्राप्त होने लगता है और पाप का नाश होने लगता है। प्रभु के गुणगाान से पापकर्म रूपी सर्पों के बंधन ढीले पड़ जाते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
जब कोई गृहस्थ भगवान की पूजा करने उनके समक्ष पहुंचता है, तो भगवान जैसा बनने के भाव उसके अंतरंग में पैदा होने लगते हैं। हमारे चित्त की यह विशेषता है कि हम जैसा देखते है जैसा सोचते हैं। हमारा चित्त उसी अनुरूप परिणमित होने लगता है। प्रभु के पास आते ही पुण्य वृद्धि को प्राप्त होने लगता है और पाप का नाश होने लगता है। प्रभु के गुणगाान से पापकर्म रूपी सर्पों के बंधन ढीले पड़ जाते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
