खुरई-प्राचीन जैन मंदिर में मुनिश्री विमलसागर जी महाराज, मुनिश्री अनंतसागरजी, मुनिश्री धर्मसागरजी, मुनिश्री अचलसागरजी एवं मुनिश्री भावसागर जी महाराज के सानिध्य में शांतिनाथ विधान संपन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने विधानमंडल पर अष्टद्रव्य के अर्घ्य समर्पित किए। श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, सामूहिक पूजन किया गया। शुक्रवार से णमोकार मंत्र की आराधना प्रारंभ होगी। प्रत्येक व्यक्ति संपूर्ण विश्व में फैल रहे कोरोना वायरस महामारी से बचने के लिए एक-एक णमोकार मंत्र का जाप नियमित रूप से करेगा एवं अपनी शक्ति अनुसार अपनी किसी प्रिय चीज का त्याग कर सकता है।
इस अवसर पर मुनिश्री विमलसागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि वर्तमान समय में व्यक्ति पैसा कमाने के लिए भागमभाग में पड़ा है। दौड़ते-दौड़ते दम भी निकल जाता है अंत में वही चार गज की जमीन ही उसे नसीब होती है। राजा हो या रंक सभी को एक न एक दिन जाना ही पड़ता है। उन्होंने कहा कि जो संयम एवं वैराग्य के मार्ग पर चलता है, वह जीवन-मरण से मुक्त हो जाता है। जो भोग-विलास में लिप्त रहता है, उसका जीवन नरक बन जाता है। अनेक असाध्य रोगों की वह गिरफ्त में आ जाता है। इस देह को सजाने संवारने इसके भरण-पोषण में व्यक्ति का जीवन यूं ही गुजर जाता है। उन्होंने कहा कि पूजा-पाठ, जप, त्याग हमें अपने मूल ग्रंथों के आमनाएं, गुरुओं के बताए अनुसार ही करना चाहिए। हम पूजा-पाठ में भी अपनी सुविधानुसार अष्टद्रव्य को सच्चे देव, शास्त्र, गुरू को अर्पित करते हैं, जो ठीक नहीं है। पूजा-पाठ में दीप एवं धूप का बहुत महत्व होता है। धूप खेने से जहां पूरा मंदिर का वातावरण सुगंध से परिपूर्ण हो जाता है वहीं दूषित वातावरण रोग आदि से मुक्ति भी मिलती है। हां, धूप को अर्पित करने में हमें पूर्ण सावधानी एवं विवेक रखना जरूरी है। इसमें किसी भी सूक्ष्म जीव का मरण न हो इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धन का संग्रह बुरा नहीं, उसे संग्रहित बनाए रखना बुरा है। यदि तुम धन का संग्रह करते हो तो उसका उपयोग करो। जहां उसकी आवश्यकता है, दीन-दुखियों की सेवा में अपने धन का उपयोग करो। पीड़ित मानवता की सहायता या कल्याण में अपने धन का उपयोग करो। धर्म, संस्कृति और समाज के उत्थान में अपने धन का उपयोग करो। राष्ट्र के विकास में अपने धन का उपयोग करो।
मन में पलने वाले असंतोष का कोई उपचार नहीं
उन्हाेंने कहा कि बड़ी गहरी प्रेरणा है। हम जहां हैं, जिस स्थिति में हैं उसमें हमें संतोष नहीं और मन में पलने वाले असंतोष का कोई उपचार नहीं। यह तभी संभव होगा जब हम अपने जीवन के मूल तत्व पहचानेंगे और जीवन को तद्नुरूप ढालने की कोशिश करेंगे। हम जितना-जितना पाते जाएंगे हमारा मन उतना-उतना अशांत होता जाता है। उन्होंने कहा कि पैसा कमाना जीवन का मकसद नहीं, आनंद पाना मकसद होना चाहिए। जीवन का रस पाना मकसद होना चाहिए। पैसा कमाओ पर पैसा ही सबकुछ नहीं। बड़े-बड़े पैसे वाले खूब पैसा कमाकर इस दुनिया से खाली हाथ चले गए। सिकंदर जैसे दौलतमंद लोगों को भी, जिसने 27 वर्ष की अल्पायु में विश्व विजेता बनने का श्रेय प्राप्त किया , वह भी इस दुनिया से खाली हाथ गया। पैसे की जीवन में वही भूमिका है जो खेत में फसल की सुरक्षा के लिए लगाई जाने वाली बाड़ की। बाड़ के रहते खेत की सुरक्षा है। कहीं ऐसा न हो कि हमारे बाड़ ही खेत खाने लग जाए। यदि बाड़ ही खेत बन जाए तो उसे क्या कहा जाए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
