सागवाड़ा -ज्ञानामृत वर्षायोग में जैन बोर्डिंग के वात्सल्य सभागार में मंगलवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य अनुभव सागरजी महाराज ने कहा कि व्यक्ति के सद्कर्म, समर्पण और उसके आचरण को सदैव सम्मान मिलता है। सद्गुणों का समावेश व्यक्ति में नहीं उसके व्यक्तित्व में होता है। संसार मे व्यक्ति की नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व की पूजा होती है। आचार्य ने कहा कि श्रेष्ठ व्यक्तित्व के लोग समाज, धर्म और राष्ट्र के निर्माण में बहुत बड़ा योगदान देते हैं। दिखावटी तौर पर सज्जन, संत एवं साधु बनना आसान हो सकता है मगर जनता की नज़र असली और नकली के भेद को भलीभांति समझ लेती है। दर्शन और प्रदर्शन में बड़ा भेद होता है। गुरू से दीक्षा लेना या दीक्षित हो जाना बड़ी बात नहीं है, उसके बाद कठोर साधना, नियम, संकल्प और निर्धारित गुणों का अनुसरण कर आध्यात्म मार्ग पर मोक्ष की ओर चलना बहुत बड़ी बात है। आचार्य ने कहा कि ताश के पत्तों से ताजमहल नहीं होता, पानी को बांध लेने से कोई समंदर नहीं होता। लड़ते रहना पड़ता है पल पल अपनी इच्छाओं से, मात्र कपड़े उतार लेने से कोई दिगंबर नहीं होता है। दिगंबर संत को कठोर संयम का पालन करना पड़ता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
