समाज में अमीरी और गरीबी का अंतर कोई नया विषय नहीं है, लेकिन आज यह खाई पहले से कहीं अधिक गहरी और स्पष्ट दिखाई देती है। एक ओर चमचमाती इमारतें, लग्ज़री गाड़ियाँ और आधुनिक सुविधाओं से लैस जीवन है, तो दूसरी ओर झोपड़ियों में गुजर-बसर करता वह वर्ग है जिसे दो वक्त की रोटी और बच्चों की पढ़ाई तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है। सवाल यह है कि क्या यह केवल आर्थिक अंतर है, या फिर अवसरों, शिक्षा और व्यवस्था की असमानता का परिणाम?
भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक प्रगति के आंकड़े अक्सर गर्व से प्रस्तुत किए जाते हैं। शहरों में मॉल, मेट्रो और मल्टीनेशनल कंपनियों की भरमार है। लेकिन इन्हीं शहरों के किनारों पर बसी झुग्गियां यह याद दिलाती हैं कि विकास का लाभ समान रूप से नहीं पहुंचा। अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि गरीब के हिस्से में अक्सर महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षा ही आती है।
गरीबी केवल पैसों की कमी नहीं है; यह अवसरों की कमी है। एक गरीब बच्चा अगर शिक्षा से वंचित रह जाता है, तो वह अपने सपनों को साकार करने की दौड़ में शुरुआत से ही पीछे रह जाता है। वहीं, अमीर परिवार का बच्चा बेहतर स्कूल, संसाधन और संपर्कों के सहारे आगे निकल जाता है। यही असमान शुरुआत आगे चलकर बड़ी सामाजिक खाई में बदल जाती है।
अमीरी भी केवल धन का नाम नहीं है। सच्ची अमीरी संवेदनशीलता, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी में भी होती है। यदि समाज का संपन्न वर्ग अपनी जिम्मेदारी समझे और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार सृजन में योगदान दे, तो यह खाई कम की जा सकती है। सरकार की योजनाएं तब सफल होंगी जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
आज आवश्यकता है ऐसी नीतियों की, जो केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव लाएं। शिक्षा को सुलभ और गुणवत्तापूर्ण बनाना, छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना और भ्रष्टाचार पर कठोर नियंत्रण—ये कुछ कदम इस दिशा में कारगर हो सकते हैं।
अमीरी और गरीबी का अंतर पूरी तरह समाप्त करना संभव भले न हो, लेकिन इसे कम जरूर किया जा सकता है। जब समाज का हर वर्ग एक-दूसरे के दर्द को समझेगा और समान अवसर देने की दिशा में काम करेगा, तभी सच्चे अर्थों में विकास संभव होगा।