श्री नबीन पुरोहित जी की कलम से
विकसित मानवीय सभ्यता के आधुनिकतम दौर में यौन दुराचार की घटनाएं स्तब्ध करने बाली हैं! अबोध बच्चियों से रेप, युवतियों से रेप, महिलाओं से रेप, गर्भबतियों से रेप,वृद्धाओं से रेप, यहाँ तक कि जानवरों से रेप!!!
मंदिरों में रेप, मस्जिदों में रेप, आश्रमों में रेप, मदरसों में रेप, यहां तक कि घरों में रेप!!!
तो थोड़ा चौंकिये जरूर, रेप के विरुद्ध आवाज उठाने बाली रैलियों में जाने से पहले जरा रुकिए, इन घटनाओं के खिलाफ मुखर होने के पहले सोचिए, मोमबती जलाने के पहले दिमाग की बत्ती जलाइए ! समाज मैं फैल रही इस सड़ांध को महसूस कीजिये और यकीन मानिए अगर थोड़ी सी भी महसूस हुई तो आप सिहर उठेंगे और शायद फिर रस्मअदायगी से इतर समाज में धीरे धीरे पैर पसार रही इस गंभीर मानसिक विकृति के मूल में आप पहुंच पाएंगे!!!
मानसिक बीमारी और विकृति नाम की चीज से तो जरूर वाकिफ होंगे, आप सब ? तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की बुनियादी जरूरतों से महरूम एक बड़ी आबादी तिल तिल करके नशे की गिरफ्त में जा रही है, हिंसक हो रही है, वहशी हो रही है मानसिक रूप से विकृत हो रही है! उठाया है इसकी रोकथाम के लिए कोई कदम???
आज आधुनिकता के नाम पर महिला को सिर्फ भोग्या की तरह ही सिल्वर स्क्रीन पर प्रस्तुत किया जा रहा है, इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो हर विषय वस्तु, और ब्रांड की उपलब्धि में महिला को जीतने की लालसा हिलोरें भर रही है। महिला को किसी तरह पाना ही हर विमर्श का ध्येयसूत्र है। आज लगभग हर वस्तु के खरीदने बेचने की घृणित लालसा का केंद्र है महिला! क्या बिकाऊ प्रॉडक्ट मात्र है, आधुनिकता और फ्रीडम के दौर में महिला ????
हॉट, बोल्ड जैसे शब्द नग्नता और आधुनिकता का पर्याय हो गए है, और इस लिहाज से तो फिर शायद आदिमानव ही सर्वाधुनिक था । कम से कम उसकी नग्नता में अभाव था, बाजार तो नही था, पूँजीबाद तो नहीं था जो कुछ भी, किसी भी तरह बेचने पर उतारू हो!!!
निश्चित रूप से आप और हम कपड़ों से ढंककर औरत की आबरू नहीं बचा सकते लेकिन क्या नग्न होकर बचा सकते है??? यह यक्ष प्रश्न है!
ये जो हमारे अशिक्षित, पिछड़े, और आर्थिक सामाजिक रूप से बेहद असमान समाज में पोर्न की सहज उपलब्धता से, बोल्डनेस और हॉटनेस की नित नई दैहिक प्रदर्शनियों से यौनिक विकृति पैर पसार रही है, है इससे किसी को इनकार???
यहां में उन कुछ प्रतिशत ब्रॉड माइंडेड, ओपन माइंडेड, एलीट क्लास की बात नहीं कर रहा हूँ उस 50% गरीब भारत की बात कर रहा हूँ जिसके पास आटा से ज्यादा उपलब्धता डाटा की है, जिसके पास नौकरी नहीं हैं, लेकिन नशा है। तो फिर इनमें पनपती यौन विकृतियों को कौन रोकेगा ?कैसे रोकेगा? है कोई उपाय???
अपने जीवन के स्वर्णिम काल यानि कि विद्यार्थी जीवन में आज युवक युवतियों को चाय के ठेलों पर, नुक्कड़ों पर सिगरेट के कश लगाते, आये दिन शराब पार्टियों को आयोजित करते फन, चिल, कूल, डूड जैसे शब्दकोश के साथ बिना किसी लक्ष्य के अपना समय बर्बाद करते हुए आप आसानी से कहीं भी देख सकते है!
क्या आधुनिक, धनाढ्य माता पिता इस आधुनिकता को टेक इट इजी कहते हुए अंगीकार करेंगे????
अगर नहीं ! तो ये मुरझाती तरुणाई का जनक कौन???
धन दौलत, सफलता की अंधी चाह में धर्म को जाने बिना, धर्म को समझे बिना, आचरण में लाये बिना, यश ऐश्वर्य की चाह में लगे हुए है कतारों में, कि बस कोई सिद्घ पुरुष आएगा और कर देगा कोई चमत्कार! बदल देगा जीवन ! आपकी इसी काम लोलुपता को धर्म के नाम पर धंधा करने बाले बहुत अच्छे से समझ चुके है, क्योंकि उनको बहुत अच्छे से पता है कि आपका धर्म एकदम सतही है, स्वार्थी है, भौतिक लालसाओं की भूख है, जिसे वो अपने छल छंदों से भुना लेंगे और करेंगे तुम्हारा शोषण ! है धर्म हमारे आचरण में?????
श्री नवीन पुरोहित जी की कलम से