सरवाड -आर्यिका विज्ञाश्री माताजी बुधवार को आदिनाथ भवन में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कहा कि मां बच्चों की पहली शिक्षक होती है जो कि बच्चों में संस्कार रूपी बीजों का रोपण करती है। उन्होंने कहा कि पाठशाला में बच्चो को केवल शिक्षा मिल सकती है, लेकिन संस्कार उसे अपने माता-पिता ही दे सकते हैं। बिना संस्कार के बच्चों का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार फिल्टर गंदे पानी को स्वच्छ जल में परिवर्तन कर पीने योग्य बनाता है। उसी प्रकार सुसंस्कार व्यक्ति को पापमय व गंदे आचरण से निकाल कर सदाचारी बनाकर समाज में जीने योग्य बनाता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को पालने का काम तो जानवर भी करते हैं लेकिन माता पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चों को शिक्षा के साथ साथ संस्कारवान भी बनाने पर ध्यान दें। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सिक्के पर लगी मुहर उसकी कीमत को दर्शाती है उसी प्रकार व्यक्ति में मौजूद संस्कार उसके गुणों को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि मां बच्चों की प्रथम पाठशाला होती है जो शिक्षा 10 लाख उपाध्याय नहीं दे सकते, वो शिक्षा एक मां दे सकती है। उन्होंने कहा कि 8 वर्ष तक बच्चा जो कुछ भी अच्छा बुरा करता है उसका फल उसके माता-पिता को जाता है। इसलिए 10 से 15 वर्ष की उम्र तक ही बच्चे संस्कारों में ढल सकते हैं। उसके बाद वे परे हो जाते हैं। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को संस्कारवान बनाएं ताकि वे समाज व राष्ट्र सेवा में अपना योगदान दे सकें।
उन्होंने कहा कि मां चाहे तो बच्चों को कंकड़ और मां चाहे तो शंकर बना सकती है। वे बच्चे खुशनसीब होते हैं जिन्हें बचपन में माता-पिता अपनी उंगली पकड़कर सिर्फ चलना ही नहीं बल्कि संस्कार रूपी मंदिर जाना भी सिखाती है। उन्होंने मौजूद लोगों से अपने बच्चों को पाश्चात्य संस्कृति से दूर रखते हुए संस्कारवान बनाने पर ध्यान देने के लिए कहा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार फिल्टर गंदे पानी को स्वच्छ जल में परिवर्तन कर पीने योग्य बनाता है। उसी प्रकार सुसंस्कार व्यक्ति को पापमय व गंदे आचरण से निकाल कर सदाचारी बनाकर समाज में जीने योग्य बनाता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को पालने का काम तो जानवर भी करते हैं लेकिन माता पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चों को शिक्षा के साथ साथ संस्कारवान भी बनाने पर ध्यान दें। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सिक्के पर लगी मुहर उसकी कीमत को दर्शाती है उसी प्रकार व्यक्ति में मौजूद संस्कार उसके गुणों को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि मां बच्चों की प्रथम पाठशाला होती है जो शिक्षा 10 लाख उपाध्याय नहीं दे सकते, वो शिक्षा एक मां दे सकती है। उन्होंने कहा कि 8 वर्ष तक बच्चा जो कुछ भी अच्छा बुरा करता है उसका फल उसके माता-पिता को जाता है। इसलिए 10 से 15 वर्ष की उम्र तक ही बच्चे संस्कारों में ढल सकते हैं। उसके बाद वे परे हो जाते हैं। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को संस्कारवान बनाएं ताकि वे समाज व राष्ट्र सेवा में अपना योगदान दे सकें।
उन्होंने कहा कि मां चाहे तो बच्चों को कंकड़ और मां चाहे तो शंकर बना सकती है। वे बच्चे खुशनसीब होते हैं जिन्हें बचपन में माता-पिता अपनी उंगली पकड़कर सिर्फ चलना ही नहीं बल्कि संस्कार रूपी मंदिर जाना भी सिखाती है। उन्होंने मौजूद लोगों से अपने बच्चों को पाश्चात्य संस्कृति से दूर रखते हुए संस्कारवान बनाने पर ध्यान देने के लिए कहा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
