भगवान के उपदेश मे संसार और मोक्ष दोनो का सुख प्रशस्त सागर जी




रहली-संसार मे सिर्फ जन्म के नाते है जो जन्म जन्मांतर तक भटकाते है लेकिन एक बार भगवान से नाता जोड़ लो तो बार बार जन्म लेने से मुक्ति और स्वयं भगवान बनने का सामर्थ आ जाता है फिर आपको नहीं संसार आपसे नाता जोडने को तैयार रहेगा उक्त उद्गार मुनि श्री प्रशस्त सागर जी महाराज ने प्रवचन सभा के दोरान कहे
    उन्होने कहा भगवान बनकर संसार छूट गया फिर भी भगवान संसारी बनकर प्राणियों को संसार से मुक्ति के लिये समवसरण मे बैठकर उपदेश देते है वह मोन रहकर उपदेश देते है जिसे केवल गणधर परमेष्ठी ही सुन पाते  है और और जन जन तक पहुचाते है उन्होने राजा श्रेर्णिक का उदाहरण देते हुये कहा प्रथ्वी पर सम्राट होते हुये भी अज्ञानता मे कुछ पाप कर लिया तो नरक गति का बंध हों गया बाद मे धर्म को समझ और धर्म को पकड़ा तो धन वैभव प्रतिष्ठा सब कुछ संसार मे मिला और तीर्थंकर प्रक्रति का बंध भी कर लिया यदि धर्म का मूल भगवान के उपदेश मे है उसे मानकर जीवन जिया जाये तो यह बहुत अल्प है वह तो मिलता ही है पर मोक्ष प्राप्ति का जो सुख भी अंनतानत सुख के रूप मे प्राप्त किया जा सकता है जीव ने कितनी बार जन्म लिया और जन्म मे कितना कमाया
       खाया एवम वर्तमान मे 99 के फेर मे मुक्ति नहीं पूरे जीवन मेहनत करो पर म्रगतृष्णा की खाई कभी भर नहीं सकती जब तक जीवन को संतोष की प्राप्ति  नहीं होती संतोषाम्रत तो केवल ज्ञान की प्राप्ति के बाद ही संभव है हों गया तो पूर्णत? निडर सर्वशक्तिमान अर्थ वह जीव भगवान बन जाता है अब आप स्वयं निर्णय कर ले संसार मे शक्तिमान बनना चाहते है वह तीनों लोको  का सर्वशक्तिमान बनना चाहते हो
         संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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