योगेन्द्र जैन पोहरी। बड़ा पुल पोहरी मुख्यालय से पूर्व की ओर 2 किलोमीटर की दूरी पर पैट्रोल पंप तथा कैलाशवासी राजमाता स्टेडियम के मध्य में अपनी दुर्दशा पर आँसू बहा रहा है।
जन सामान्य की सुरक्षा की दृष्टि से विगत और वर्तमान दोनों ही सरकारों के नुमाइंदे अपने वादे और विकास के नाम पर लहराए गए घोषणा-पत्रों पर पूरी तरह खोखला साबित हो रहे हैं। वैसे तो उम्रदराज वरिष्ठ नागरिकों के लिए शासन ने अनेक सुविधाओं के पिटारे खोल रखे हैं। विकलांगों को भी दिव्यांग उपाधि से नवाजा गया हैं, किन्तु यह वयोवृद्ध 'बड़ा पुल' किसी कर्मचारी, अधिकारी व शासन-प्रशासन की नज़र में आज भी वरिष्ठ नहीं बन सका। यह अपने कमजोर पैरों पर खड़ा तो है, किन्तु कब धरासाई हो जाए कुछ पता नहीं। लापरवाही से चलने वाले वाहनों से यह अपने दोनों तरफ के हाथों को खो चुका है। अपनी छाती से गुजरने वाले मासूम बच्चे, बुजुर्ग एवं छोटे-बड़े वाहनों की सुरक्षा करने में असहाय, बेवश और भयभीत दिखाई देता है।
जन सामान्य की सुरक्षा की दृष्टि से विगत और वर्तमान दोनों ही सरकारों के नुमाइंदे अपने वादे और विकास के नाम पर लहराए गए घोषणा-पत्रों पर पूरी तरह खोखला साबित हो रहे हैं। वैसे तो उम्रदराज वरिष्ठ नागरिकों के लिए शासन ने अनेक सुविधाओं के पिटारे खोल रखे हैं। विकलांगों को भी दिव्यांग उपाधि से नवाजा गया हैं, किन्तु यह वयोवृद्ध 'बड़ा पुल' किसी कर्मचारी, अधिकारी व शासन-प्रशासन की नज़र में आज भी वरिष्ठ नहीं बन सका। यह अपने कमजोर पैरों पर खड़ा तो है, किन्तु कब धरासाई हो जाए कुछ पता नहीं। लापरवाही से चलने वाले वाहनों से यह अपने दोनों तरफ के हाथों को खो चुका है। अपनी छाती से गुजरने वाले मासूम बच्चे, बुजुर्ग एवं छोटे-बड़े वाहनों की सुरक्षा करने में असहाय, बेवश और भयभीत दिखाई देता है।
इस पुल को विकलांग हुए करीब तीन वर्ष हो चुके हैं। चूंकि किसी भी शासन को यह अपना वोट नहीं दे सकता, शायद अनदेखी का यह भी एक बड़ा कारण हो। खैर! जो भी हो। इस बृद्ध पुल को अनदेखा करने की कीमत किसी बड़े हादसे के रूप में सभी को चुकानी पड़ सकती है।
संबंधित विभाग मौन है, पुल से गुजरने के बाद भी आलाकमान अंजान हैं, जिले का मुखिया असंज्ञान में हैं, तो जर्जर पुल का जन प्रतिनिधि बेटा भी अपनी आँखों पर चस्मा लगा चुका है। पुल को रोदते हुए नीचे गिरे वाहन, लोगों के साथ हुए हादसे, सब चुनावी वादों की तरह किसी को याद नहीं। विकास के पथ पर चलने वाले लोगों के पास इतना समय कहाँ कि जीर्णोद्धार या नवीनीकरण क बारे में कोई विचार कर सके। बेचारे पुल पर अब तो चुनावी आचार संहिता का ग्रहण भी लग चुका है। राहगीरों के हितों की चिंता अब किसको है, कुछ पता नहीं।
इस पुल से हजारों की संख्या में पैदल, साइकिल, मोटर साईकल, जीप, माल से लदे हुए ट्रक, यात्रियों से भरी बसें प्रतिदिन पार होती हैं। वहीं फसल से भरे हुए किसानों ट्रेक्टर, तो नौनिहालों को लेकर स्कूल बस गुजरने के लिए मजबूर हैं। जनता और जन-प्रतिनिधि को मिलकर इस समस्या का तकाल हल ढूँडना होगा, अन्यथा किसी के साथ कब क्या हो, कुछ कहा नहीं जा सकता।
"बहुत हो चुकी अनदेखी, अब तो आँखें खोलो।
पुल को भी तो लेकर भैया, अपनी गाँठें खोलो।।"
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इनका क्या कहना है
बड़ा पुल क्षतिग्रस्त होने के बाद भी प्रशासन व जनप्रतिनिधि पुल सुधारने की जगह बड़े हादसे के इंतजार में बैठे है
राम सिंह
बड़ा पुल क्षतिग्रस्त होने के बाद भी प्रशासन व जनप्रतिनिधि पुल सुधारने की जगह बड़े हादसे के इंतजार में बैठे है
राम सिंह
कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है अभी कुछ माह पहले डफर भी गिरा है भाग्य अच्छा था बच गए
नवल कुशवाहा
नवल कुशवाहा

