दमोह-संसार में राग द्वेष की चक्की में संसारी जीव अनादिकाल से पिसता चला जा रहा है। राग द्वेष के कारण ही मनुष्य का संसार बढ़ता जा रहा है। राग द्वेष की चक्की के बीच स्थित कील से जो चिपक जाता है वह पिसने से बच जाता है।
इसी तरह धर्म की कील से जो लग जाता है वह संसार के दुखों से बच जाता है। धर्म के साथ साथ जो शरीर की नश्वरता का चिंतन करता है उसके जीवन में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।
यह बात मुनिश्री अभयसागर जी महाराज ने प्रवचनों में दिगंबर जैन धर्मशाला में अभिव्य किए।
हमें अपने जीवन मेंने सच्चे गुरू को ही स्वीकार्य करना चाहिए प्रभात सागर जी
मुनि श्री प्रभात सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों में कहा कि हमें अपने जीवन मेंने सच्चे गुरू को ही स्वीकार्य करना चाहिए क्योंकि कु गुरू तो पत्थर की नाव की तरह होते हैं जो स्वयं भी डूबते हैं और दूसरें को भी डूबा देते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
इसी तरह धर्म की कील से जो लग जाता है वह संसार के दुखों से बच जाता है। धर्म के साथ साथ जो शरीर की नश्वरता का चिंतन करता है उसके जीवन में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।
यह बात मुनिश्री अभयसागर जी महाराज ने प्रवचनों में दिगंबर जैन धर्मशाला में अभिव्य किए।
हमें अपने जीवन मेंने सच्चे गुरू को ही स्वीकार्य करना चाहिए प्रभात सागर जी
मुनि श्री प्रभात सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों में कहा कि हमें अपने जीवन मेंने सच्चे गुरू को ही स्वीकार्य करना चाहिए क्योंकि कु गुरू तो पत्थर की नाव की तरह होते हैं जो स्वयं भी डूबते हैं और दूसरें को भी डूबा देते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
