जो अपने आप को जीते वही बनता है महावीर- प्रमाण सागरजी



सनावद-भगवान महावीर का जन्म ऐसे समय में हुआ जब सर्वत्र हिंसा का वातावरण था। निर्दोष मूक प्राणियों को हिंसा की आग में झोंका जा रहा था। नारियों के प्रति असमानता व्याप्त थी। तब भगवान महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की अवस्था में जिन दीक्षा ली और 12 वर्ष तक कठोर तपस्या की। जब उन्हें केवलज्ञान हुआ तब 30 वर्ष तक उन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत, स्यादवाद तथा सर्वोदयवाद का उपदेश दिया। भगवान महावीर का तीर्थ सर्वोदयवादी था। इसमें वर्गोदय के विरुद्ध सभी के उदय, अभ्युदय और कल्याण की भावना निहित थी। जो कर्म शत्रुओं को जीतने के लिए विकारी भावों पर विजय प्राप्त करें और स्वयं को जीते। वही महावीर कहलाता है। युद्ध में तो कोई भी जीत सकता है लेकिन जो अपने आप को जीते वही महावीर बनता है।
जैन ग्राउंड पर महावीर जन्म कल्याणक पर हुई धर्मसभा में पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने यह बात कही। मुनि श्री विराट सागर जी महाराज ने मंगल भावना प्रस्तुत की।
            संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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