साधना के बल पर कर्मभूमि का मनुष्य तीर्थंकर पद को प्राप्त कर लेता है: मुनिश्री




कुंडलपुर-सुख अनेक प्रकार का होता है, एक इंद्रियातीत होता है और इंद्रियों से मिलने वाला सुख होता है। भूख लगने पर कठर अनुभव होता है, भोजन करने पर तृप्ति होती है। किंतु सदा के लिए तृप्ति नहीं होती। ज्ञान से जो सुख की प्राप्ति होती है, वह अन्य कहीं भी प्राप्त नहीं होता है।
मोक्ष मार्ग में आस्थागत ही सुख है। मोक्ष मार्ग की सम्यगदर्शन प्रथम सीढ़ी है। मोक्ष मार्ग में शरीर का पोषण नहीं होता मोक्षमार्ग भोग विलास की वस्तुओं का परित्याग कर देता है। मोक्ष मार्गी अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर वह इंद्रियातीत सुख को प्राप्त करता है। जिन भक्ति से साधक पुण्य से देवेंद्र और चक्रवर्ती जैसे पदों को प्राप्त कर लेता है। धर्म के प्रभाव से साधक तीर्थंकर के पद को प्राप्त कर लेता है। तीर्थंकर का पद जिनेंद्र भगवान की भक्ति प्राप्त कर लेता है।
तीर्थंकर के चरणों में तीन लोक की संपदा पड़ी होती है। साधना के बल पर कर्मभूमि का मनुष्य तीर्थंकर पद को प्राप्त कर लेता है। अनेक जन्मों की साधना से तीर्थंकर पद को मानव प्राप्त करता है। संसारी प्राणी पंचइंद्रियों के सुखों को अनंत बार भोगने पर भी उसी जैसा प्रतीत होता है। जैसे प्रथम बार सुखों का अनुभव करता है। ये वचन निर्यापक मुनि श्री समय सागर जी महाराज ने रविवार को कुण्डलपुर के विद्या भवन में अभिव्यक्त किए।
मुनि श्री ने अपने मंगल प्रवचनों में आगे कहा कि जब भेद विज्ञजन हो जाता है तब मनुष्य को संसार असार नजर आने लगता है। सम्यगदर्शन होने के बाद संसार चुल्लु भर रह जाता है। साधना से आत्मा पवित्र होती है हमारी आत्मा को आचार्यों ने नदी की उपमा दी है आत्मा में संयम रूपी जल है शील रूपी तट है जिसमें दया रूपी तरंगें उठती रहती है। संसारी प्राणी की दृष्टि आत्मा की ओर नहीं वरन शरीर की ओर लगी रहती है, जिसमें वह पापार्जन ही करता रहता है उसका पतन होता रहता है पवित्र परिणामों विचारों से उत्थान होता है। एक क्षण का पाप करोड़ों वर्षों तक भोगना पड़ता है।
इस मौके पर प्रचार मंत्री सुनील वेजिटेरियन ने आगामी 29 सितम्बर को पंच स्वर्ण महोत्सव में होने जा रहे कार्यक्रमों की जानकारी दी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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