कागदीपुरा-शिक्षण संस्थानों की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य ज्ञानार्जन के साथ संस्कारित शिक्षा देना है। आज की पीढ़ी भटक रही है इसलिए शिक्षण शिविरों के माध्यम से उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाना चाहिए। संस्कार समाज व संस्कृति का परिदृश्य है। बदलते परिवेश में संस्कारों की आवश्यकता है। यह बात कागदीपुरा के जैन भवन में आयोजित भजन संध्या व दीक्षा जयंती समारोह में प्रवचन देते हुए आचार्य श्री प्रणाम सागरजी महाराज ने कही।
आचार्य ने आगे कहा आज की पीढ़ी भटक रही है। आज हमें युवा शक्ति की जरूरत है। चाहे वह धार्मिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक। आज के युवा में शक्ति तो है लेकिन विचार और आचरण की कमी है। उत्साह में वे अपने संस्कार, संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। हम अपनी पहचान व स्वाभिमान छोड़ते जा रहे हैं। जिसका स्वाभिमान न हो उसे मानव नहीं कहा जा सकता। मानव का एक साधारण लक्षण है और वह है स्वाभिमान। क्या आप कभी अपने बच्चे को धार्मिक कार्यों में साथ लेकर गए। क्या आपने उसे संतों के, तीर्थ क्षेत्रों के दर्शन कराए। क्या उसे देव, गुरु, शास्त्र का स्वरूप बताया। उस समय तो आप यही कहते रहे कि बच्चा है, पढ़ाई कर रहा है। बचपन में आप उसे संस्कार दे देते तो वह युवा होने पर अपने परिवार, धर्म, विचार, कर्तव्य के बारे में समझ सकता। गलती हमने की है और उसकी सजा आने वाली पीढ़ी को मिले यह आप विचार करना और अपने मन से पूछना आपको उत्तर अपने आप मिल जाएगा। इसलिए बच्चों को दोष देने से पहले आप अपने आचरण के बारे में सोचें कि वह कैसा था। वह किस प्रकार के संस्कारों से बना था।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
