बीना -नाभिनंदन जैन विद्यालय परिसर मे धर्मसभा को सबोधित करते हुए मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने कहा कि मत भूलो कि एक दिन सब छोड़कर जाना है। मर गए नो नोकर चाकर हाथ बांधे खड़े रहेगे, तिजोरी पड़ी रहेगी, और महल अटारी खड़ी रहेगी। पत्नी रोते हुए गली के मोड़ तक आपको छोड़ आएगी और अर्थी के साथ चलने वाले कहेगे , भया जरा जल्दी करो दुकान भी खोलना है। आफिस भी जाना है। ज्यादा लकड़ी लगाओ और जल्दी जलाओ। शमशान तक चलने वाले चार, चालीस, चार सौ चार हज़ार भी मिल जाएगे,पर शमशान से आगे चलने वाले जिंदगी मे किए शुभ अशुभ, अच्छे बुरे कर्म ही होंगे।
मुनि श्री ने कहा हमारी बहनों को भी बहुत गुस्सा आता है। झगड़ा करेगी तो सास से और गुस्सा उतारेगी बच्चो पर, उन्होंने कहा मेरा मानना है आपसी समझ से झगडे को सुलझाया जा सकता है। पति पत्नी मे किसी बात पर बहस हो गई। विवाद इतना बढ़ गया कि पत्नी रुठ गईं और कह दिया लो सम्हालो अपनी घर गृहस्थी, मैं चली अपने मायके। पति समझ गया मामला गंभीर है। रुख बदला और बोला ठीक है, तुम अपने मायके चले जाओ, हम बेबो ससुराल घूम आएगे औऱ बच्चे भी अपने ननिहाल में रह आएगे।
मुनि श्री ने कहा क्रोध आग है। क्रोध की आग बड़ी खतरनाक होती है। पता नही कब किसकी क्रोध की आग भड़क जाए और उस आग से परिबार की खुशियां धुधु करके जलने लगे। इसीलिए अपने घर में थोड़े जल की व्यवस्था रखिए। जल यानी क्षमा और सहनशीलता, सहनशील बनिए। अपने में सहिष्णुता पैदा करिए।
मुनि श्री ने कहा जो आदमी बीड़ी सिगरेट पी रहा है, वह जीते जी खुद अपने को मुखाग्नि दे रहा है। सप्त व्यसन से बचे एवं अपने जीवन को सुखमय बनाए, तभी हमारा प्रवचन करना सार्थक है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
