आस्था और सांस्कृतिक परम्पराओं की नगरी है आष्टा

आष्टा-व्यवहार और आचरण में शुचिता, निरन्तरता और पारदर्शिता आपके  व्यक्तित्व को निखारती है। संतत्व का अर्थ है कठोर आत्मानुशासन अपने जीवन  को प्रखर और आस्था को प्रगाढ़ बनाए रखने के लिए शास्त्रों पर अमल करने के  साथ ही सकारात्मक और प्रेक्टिकल नजरिये को भी अपनाना चाहिए।
यह बातें  आचार्यश्री विद्यासागरजी के शिष्य मुनि श्री  विराट सागरजी महाराज ने कहीं। नगर  में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की आज्ञा से संघ प्रमुख मुनि सम्भव सागरजी  महाराज की अगुवाई में बीते एक सप्ताह से धर्म गंगा बह रही है। जैन साधुओं  की कठोर साधना और आहार निहार चर्या भी नागरिकों के कौतूहल का विषय बनी हुई  है। कंपकंपाती ठंड और कोहरे के बीच दिगंबर साधुओं का चौबीस घंटे में सिर्फ  एक बार अन्न जल ग्रहण करने के लिए विधिपूर्वक निकलना तथा मुनियों के त्याग,  संयम और अहिंसा के प्रति अपूर्व साधना से नगरवासी अभिभूत है। साधु संघ के  प्रेरक उद्बोधन का लाभ भी नगर वासियों को प्राप्त हो रहा है। पूर्व  नपाध्यक्ष कैलाश परमार सहित अनेक जैनेतर बन्धुओं ने आज प्रगति निवास पर  आहारचर्या के बाद मुनि श्री विराट सागरजी महाराज  को नगरवासियों की आस्था और सांस्कृतिक  परम्पराओं से अवगत कराया। नगर में होने वाले धार्मिक आयोजनों की जानकारी  दी। वहीं किला मन्दिर पहुंच कर सभी मुनि महाराज के दर्शन किए। इस अवसर पर  अजीत कुमार जैन, सुनिल जैन प्रगति, शुभम शर्मा, प्रशाल जैन सहित अन्य  उपस्थित थे।
       संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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