भोजन से भाव और भाषा दोनों ही होती है प्रभावित आचार्य श्री

रमना रोड जैन भवन के धर्मसभा में आचार्य  श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने दिया प्रवचन, उमड़े भक्त

गया-गया में प्रवास कर रहे दिगंबराचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने सोमवार को रमना रोड स्थित जैन भवन के धर्मसभा में प्रभु भक्ति के साथ-साथ शुद्ध भोजन पर प्रवचन दिया।  आचार्य श्री ने कहा कि प्रभु भक्ति से भव-भव में संचित पाप क्षण भर में विलय को प्राप्त हो जाता है। भक्ति से प्रबल पुण्य और मुक्ति की प्राप्ति होती है। प्रभु भक्ति से चित्त शुद्धि व आत्म विशुद्धि होती है। आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त होता है। मोह-राग रूपी दोषों का शमन होता है। वहीं पवित्र भोजन से चित्त एवं चरित्र दोनों ही शुद्ध होता है। उन्होने  कहा कि जैसा अन्न खाओगे वैसा मन होगा।
अज्ञान का क्षय हो, आत्म विजयच हो
गुरु वाणी को सुन अब पुरुषार्थ यह करो कि पाप प्रवृत्ति से विरक्ति हो। कषाय भाव की शून्यता हो। ज्ञान में लीनता हो। अज्ञान का क्षय हो। आत्म विजय हो। आत्म कल्याण मात्र चर्चा से नहीं होगा। चर्चा के साथ चर्या आचरण भी आवश्यक है। जैसी चर्चा होगी वैसी चर्या होगी। जैसी सोच होगी वैसा आचरण होगा।
शाकाहार ही है उत्तम भोजन
शाकाहार ही उत्तम भोजन है। शाकाहार शुद्धाहार, मानव आहार। अशुद्धाहार दानव आहार। अशुद्धाहार से चित्त एवं चरित्र दोनों ही अशुद्ध होते है। खान-पान, वेष-भाषा से भाव प्रभावित होते है। भावों की पवित्रता से सर्वसिद्धि होती है। भावों ही भविष्य निर्मित होता है। भाव संभाल लो तो भव भी संभल जाएगें।
है। आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त होता है। मोह-राग रूपी दोषों का शमन होता है। वहीं पवित्र भोजन से चित्त एवं चरित्र दोनों ही शुद्ध होता है। आचार्य श्री ने कहा कि जैसा अन्न खाओगे वैसा मन होगा।
      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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