धनुर्धर सिद्धार्थ: अद्भुत पराक्रम से जीता सम्मान, कठिन परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर हुआ यशोधरा से विवाह



धनुर्विद्या में अद्वितीय कौशल का प्रदर्शन देख स्तब्ध रह गए राजा-महाराजा

राजकुमार सिद्धार्थ के किशोरावस्था के दिनों से जुड़ा एक रोचक और प्रेरक प्रसंग उनकी विलक्षण प्रतिभा और शौर्य को दर्शाता है। जब सिद्धार्थ 16 वर्ष की आयु को प्राप्त हुए, तब उनके पिता राजा शुद्धोधन ने परंपरा के अनुसार आस-पास के राज्यों में विवाह प्रस्ताव भेजे। किन्तु प्रारंभिक प्रतिक्रिया निराशाजनक रही। कई राजघरानों ने यह कहकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि केवल सौंदर्य और शालीनता पर्याप्त नहीं होती, एक राजकुमार में युद्धकला, विशेषकर धनुर्विद्या का कौशल होना चाहिए, तभी वह राज्य की रक्षा और संचालन करने योग्य माना जाता है। इन तानों और शंकाओं से अवगत होने पर राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को धनुष की शक्ति और युद्धकला के महत्व के बारे में समझाया। शांत स्वभाव के सिद्धार्थ ने बिना किसी आक्रोश के धनुष मँगवाने का आग्रह किया और सभा के समक्ष अपनी क्षमता सिद्ध करने का निर्णय लिया।
धनुष उठाते ही छा गया सन्नाटा

धनुष लाया गया। सिद्धार्थ ने सहज भाव से प्रत्यंचा को अंगूठे से घुमाकर उसकी दृढ़ता परख ली। फिर बाएँ हाथ से धनुष संभालकर दाएँ हाथ से तीर चढ़ाया और प्रत्यंचा को पूरी शक्ति से खींचकर तीर छोड़ा। तीर की सनसनाहट इतनी तीव्र थी कि उपस्थित लोगों को वह बादलों की गर्जना जैसी प्रतीत हुई। शांत और सौम्य दिखने वाले राजकुमार की यह शक्ति देखकर दर्शक विस्मित रह गए।
कठिन से कठिन लक्ष्य साधे

इसके बाद सभा में उपस्थित निर्णायकों ने क्रमशः कठिन परीक्षाएँ रखीं

आठ इंच मोटी धातु की प्लेट लक्ष्य के रूप में रखी गई, जिसे सिद्धार्थ ने एक ही तीर में भेद दिया। चार इंच मोटे तने को आर-पार कर अपनी शक्ति और सटीकता का परिचय दिया। रेत से भरी बैलगाड़ी में गाड़े गए सूखे डंठल को दूर से लक्ष्य कर काट गिराया। अंतिम और अत्यंत कठिन परीक्षा में दूर लटकाए गए घोड़े के एक बाल को लक्ष्य कर तीर चलाया गया, जिसे उन्होंने सटीकता से भेदकर अपनी अद्भुत एकाग्रता सिद्ध कर दी। इन सभी परीक्षाओं में सिद्धार्थ की दक्षता देखकर सभा में उपस्थित राजा-महाराजा और जनसमूह आश्चर्यचकित रह गए।
सम्मान और विवाह का मार्ग प्रशस्त

राजकुमार की वीरता, कौशल और धैर्य से प्रभावित होकर अंततः सभी शंकाएँ दूर हो गईं। इसी अवसर पर राजकुमारी यशोधरा का आगमन हुआ और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ सिद्धार्थ और यशोधरा का विवाह संपन्न हुआ।

यह प्रसंग सिद्धार्थ के जीवन का वह अध्याय प्रस्तुत करता है, जब वे राजसी वैभव, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक थे, आगे चलकर यही राजकुमार त्याग और ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होकर मानवता के लिए प्रेरणा बने।

लेखक : मोतीलाल आलमचंद्र

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