इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सईद अली खामेनेई के निवास से चंद मीटर की दूरी पर बमबारी हुई है। इससे पहले भी इजरायल द्वारा ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमला किया गया। प्रतिक्रिया में ईरान ने अमेरिका के ठिकानों पर मिसाइल दागीं। इजरायल के दक्षिणी हिस्से में 12 लोगों की मौत हुई है। जाहिर है कि स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है।
दरअसल, मध्य पूर्व एक बार फिर संकट के दौर में पहुंच चुका है। ईरान द्वारा पलटवार, खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले, खाड़ी-ईरान तनाव, और लगातार बढ़ती बयानबाजी—ये संकेत हैं कि यह संघर्ष सीमित नहीं रहने वाला। यदि हालात तुरंत काबू में नहीं लाए गए तो यह व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। इसलिए इस समय की सबसे बड़ी जरूरत राजनीतिक संयम और कूटनीतिक पहल की है। यह संघर्ष केवल तीन देशों की प्रतिद्वंद्विता नहीं है, बल्कि इसके जलजले से दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। ईरान के इस मार्ग को बंद कर देने पर तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। इसका सीधा असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, महंगाई बढ़ेगी, लॉजिस्टिक लागत में इजाफा होगा। आम आदमी की थाली से लेकर दुनिया की विकास योजनाओं तक सब पर इसका असर पड़ेगा। शेयर बाजारों में गिरावट और वैश्विक मुद्रा बाजार अस्थिरता की चपेट में आ सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। उसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। तेल महंगा होने पर व्यापार घाटा बढ़ेगा, रुपया दबाव में आएगा, विकास दर प्रभावित होगी। इसके साथ ही खाड़ी देशों में रह रहे लगभग 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा भी बड़ा प्रश्न बन जाएगी। यदि संघर्ष फैलता है तो वहां उनकी जान को खतरा हो सकता है। बल्कि भारत को मिलने वाली भारी विदेशी मुद्रा, रेमिटेंस, पर भी असर पड़ेगा। वापसी की स्थिति में एयरलिफ्ट और राहत जैसे मानवीय प्रयासों पर भी भारी दबाव पड़ेगा।
मानवीय दृष्टि से भी यह युद्ध भयावह परिणाम दे सकता है। गाजा और पश्चिम एशिया पहले से अस्थिर हैं। एक नया मोर्चा लाखों लोगों को विस्थापन की ओर धकेल सकता है। निर्दोष नागरिक, महिलाएं और बच्चे इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाएंगे। युद्ध समाधान का माध्यम नहीं है, इसे इतिहास ने बार-बार साबित किया है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और इजरायल की सुरक्षा चिंताएं वास्तविक हैं, परंतु इनका समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से ही संभव है। यदि यह आग भड़कती है तो क्षेत्रीय अस्थिरता के साथ वैश्विक महाशक्तियों की भी प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ सकती है।
इस समय संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, रूस, चीन और क्षेत्रीय शक्तियों को तत्काल मध्यस्थता की पहल करनी चाहिए। अमेरिका, ईरान और इजरायल—तीनों को संयम दिखाना होगा। संघर्ष विराम, संवाद और विश्वास बहाली के कदम उठाने होंगे। यह समय युद्ध को हवा देने का नहीं, बल्कि उसे रोकने का है।
आज दुनिया पहले से ही कोविड-19 के बाद आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। एक और बड़ा युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरी मंदी में धकेल सकता है। इसकी कीमत आम नागरिकों, खासकर विकासशील देशों को चुकानी पड़ेगी। यह केवल मध्य पूर्व का मसला नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता का प्रश्न है।
जाहिर है कि विश्व शांति और आर्थिक संतुलन के लिए यह विनाशकारी युद्ध तुरंत रुकना जरूरी है।