मैं सुखी रहूं और जगत भी खुश रहे, इसका भाव है स्वर्ग का द्वार: सुधासागरजी




अलोद-दूसरे को मिटाने के लिए अपने को भी लुटाने का भाव आना नर्कगामी है। मैं भी सूखी रहूं और जगत भी खुश रहे, इसका भाव स्वर्ग का द्वार है। यह उदगार मुनि सुधासागरजी महाराज ने अलोद के दिगंबर जैन मंदिर परिसर में अपने मंगल प्रवचन के दौरान व्यक्त कििए ।
उन्होंने जगत कल्याण की सीख दी। मुनिश्री ने स्वयं के साथ सबका भला चाहने को विशुद्ध भाव की संज्ञा देते हुए शास्त्रों के मार्मिक प्रसंग सुनाए। उन्होंने भाव शुद्धि के उपाय भी बताए। साधना निरंतर अभ्यास से मन को सर्वकल्याण के मार्ग पर चलाने के तरीके सुझाए। मोक्ष के सबसे दुर्लभ मानव जीवन का लक्ष्य बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि तप, कर्म, गति व पानी से इसकी शुरुआत होती है। मानुष पर्याय मिलना, उसमें से भी अच्छे कुल में जन्मना वृत्ति होना फिर बोधि और सम्यक ज्ञान प्राप्त करने को दुर्लभ बताया। उन्होंने धर्म आचरण अपनाने की राह दिखाते हुए कहा कि हम कर्मों को काटकर शरीर से रहित कर आत्मा को अनंतकाल के लिए स्थिर कर दें, यही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।
मुनिश्री के सानिध्य में जिज्ञासाओं का हो रहा समाधान
पं. जितेंद्र शास्त्री व मनोज शास्त्री ने बताया कि मुनिश्री के सानिध्य में भगवान के नित्य अभिषेक, शांतिधारा, आहारचर्या, मंगल प्रवचन व जिज्ञासा समाधान की ज्ञान गंगा में देशभर के पुण्यार्जक धर्म लाभ कमा रहे हैं। शाम को श्रावक जिज्ञासा समाधान में अपना कल्याण कर रहे हैं।
ध्वजारोहण के साथ महोत्सव शुरू
अलोद के जन मंदिर परिसर मेें ध्वजारोहण के साथ ही वेदी प्रतिष्ठा एवं विश्वशांति महायज्ञ कार्यक्रम की शुरुआत हो गई।
        संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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