बच्चों काे धर्म और संस्कारों की शिक्षा के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी माता-पिता की है

दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र छोटा महावीरजी कागदीपुरा में आचार्य प्रणामसागरजी ने धर्मसभा कर कहा
कागदीपुरा -संसार में मानव के रूप में जन्म लेना एक अलग बात है और मानव होना अलग बात। मनुष्य योनी प्राप्त कर लेने मात्र से कोई मानव नहीं कहा जा सकता। मानव होने के लिए परंपरागत मानवीय मूल्यों का होना जरूरी है। ये जीवन मूल्य उसे अपनी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की त्रिवेणी से प्राप्त होते है। व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का बीजारोपण होना चाहिए पर आज ऐसा नहीं हो रहा है। क्योंकि लौकिक ज्ञान के साथ हम युवा पीढ़ी को संस्कृति का पाठ नहीं पढ़ा रहे हैं। हम हमारी पुरातन संस्कृति, सभ्यता के आदर्शों और परंपराओं की जड़ों से निरंतर कटते जा रहे है। इसमें हमारी दूरी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने हमारे संस्कारों का नाश कर दिया है। इसलिए आज ऐसी घटनाओं का ग्राफ बढ़ता जा रहा है जिसमें मनुष्यता का ह्रास साफ दिखाई दे रहा।
यह बात दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र छोटा महावीरजी कागदीपुरा में गुरुवार काे आचार्य प्रणामसागरजी ने धर्मसभा में कही। आचार्य श्री ने कहा आप चाहे तो मनुष्य बनकर पशु, नारकी, देव या भगवान बन सकते है। पार्श्वनाथ भगवान के आज दुनिया में सबसे ज्यादा उपासक है क्योंकि पार्श्वनाथ ने अपने दस भवों तक लगातार अपने उपसर्गों को सहन कर अपने आप को स्वर्ण की भांति तृप्त किया। तत्पश्चात स्वर्णिंम आभा प्राप्त कर तीर्थंकर पद प्राप्त किया। हमें बच्चाें काे आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ संस्कारों की शिक्षा देने की तैयारी करना हाेगी। बच्चों काे धर्म-संस्कारों की शिक्षा के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी हर माता-पिता की है। जब भी बच्चा संस्कारों के विपरीत कुछ करता पाया जाए तो उसे उसी क्षण मां को थप्पड़ लगा देनी चाहिए। फिर कभी वह बच्चा संस्कारों से गिरेगा नहीं। 
          संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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