सागर-वर्धमान कॉलोनी स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में धर्मसभा को संबोधित करते हुए ऐलक श्री सिद्धांत सागर जी महाराज ने कहा भारतीय संस्कृति में वैदिक पद्धति में यह एक अवधारणा है कि अगर एक धागा भी होगा तो बैकुंठी की प्राप्ति नहीं होगी। इसलिए भारतीय संस्कृति में अपरिग्रह के रूपों को साकार करने के लिए दिगम्बर रूप धारण किया करते हैं। उन्होने कहा कि भारतीय संस्कृति और समाज की सभ्यता के पूर्ण नियमों का पालन करते हैं और उन्हें नग्न रूप धारण करने वाले साधकों को कभी भी गलत नहीं कहा जा सकता है। यह सभ्यता का मायना तो हमारे भारत देश में आयातित लोगों के द्वारा एक अवधारणा सृजित की गई है। जिसके कारण से लोग नग्नता को साधना का अंग मानने से डरने लगे हैं परंतु भारतीय संस्कृति में वैदिक संस्कृति में आज भी ना जाने कितने लोग नग्न साधना करते हैं। संत वह होते हैं जो बाह्य और आडंबर से दूर होकर छल, कपट, दंभ इन सबसे दूर हट जाते हैं। वास्तविक साधु ही वासना को रोक करके और अपनी साधना को बढ़ाते है। कहा जाता है नंगा खुदा से बड़ा होता है। वह वास्तव में अपने जीवन को दिगम्बरत्व धारण कर धन्य कर लेते हैं। ऐसे दिगम्बर साधु आचार्य विद्यासागर जी जैसे इस भारत देश के राष्ट्र संत बन चुके हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
