सागर -हर समस्या का समाधान मात्र पुरुषार्थ से नहीं निकलता है। जहां तक हमारी बुद्धि चलती है वहां तक पुरुषार्थ कार्य करता है। जहां बुद्धि चलना बंद हो जाती है, वहां पर हमें बहुत सारे कार्यों को भाग्य पर छोड़ना पड़ता है। यह भारतीय दर्शन का एक मध्यम चिंतन मार्ग है। इस चिंतन को यह कह सकते हैं कि किसी भी तत्व को झूठ या सच नहीं कहा जा सकता है। ना तो भाग्य को बदला जा सकता है। पुरुषार्थ एवं भाग्य दोनों के समन्वय के माध्यम से ही हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। यह उद्गार ऐलकश्री सिद्धान्त सागर जी महाराज ने वर्धमान कॉलोनी में धर्मसभा में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा पुरुषार्थ को स्वीकार करने पर व्यक्ति अहंकारी बन जाता है। प्रभु की सत्ता को स्वीकार करते हुए उसे भाग्य को भी स्वीकार करना पड़ेगा, जो भाग्यहीन होता है उसका कोई कुछ नहीं कर सकता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
