इंजी. वीरबल सिंह
मध्यप्रदेश की राजनीति में मार्च 2020 सदियों याद रखा जाएगा क्योंकि मार्च के वो सत्रह दिन भुलाए नहीं भूल सकते जिन्होंने पंद्रह वर्ष का वनवास पूरा कर सूबे की राजनीति की गद्दी पर बैठी कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया तो वहीं 2018 के आम चुनाव में वोट प्रतिशत अधिक होने के बावजूद सीटें कम होने की बजह से भारतीय जनता पार्टी सत्ताधीश नहीं बन सकी । पंद्रह वर्ष के वनवास को पूरा कर वापिस लौटी कांग्रेस खुशी के दिए जला रही थी लेकिन अंदरखाने में सब कुछ ठीक नहीं था, पहले तो मध्यप्रदेश में सरकार का मुखिया कौन होगा इस बात पर खूब नूराकुश्ती हुई लेकिन आलाकमान ने जब कमल सत्ता से बाहर हुआ तो नाथ को मध्यप्रदेश का मुखिया बनाकर राजा और महाराजा को निराश कर दिया । दिग्गी राजा तो कमलनाथ के करीबी थे तो उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने का मलाल नहीं था और वैसे भी उनके समर्थक विधायकों की संख्या कम नही थी ऐसे में सरकार हर फैसले में कमलनाथ दिग्विजय सिंह की रायसुमारी लिया करते थे,या राजनीति की भाषा में कहा जाए तो पर्दे के पीछे सत्ता की बागडोर दिग्विजय सिंह के हाथ ही थी । श्यामला हिल्स ही वादियों के आनंद का लुफ्त न उठाने का मलाल अगर किसी को था तो वे ज्योतिरादित्य सिंधिया ही थे ,और ये मलाल तब और बढ़ गया जब वे अपने सिपसलाहाकर से ही लोकसभा चुनाव हार थे, चुनाव हार जाने के बाद जब एक बार फिर समर्थकों के माध्यम से ही सही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अध्यक्ष पद की जोर आजमाइश में लग गए लेकिन मुख्यमंत्री और पीसीसी चीफ दोनों के नाथ कमलनाथ ही थे ,ये पराजय की कसक तब और दर्द देने लगी जब मोदी सरकार ने सिंधिया को बंगला यानी दिल्ली निवास को खाली करने का नोटिस थमा दिया, ये बंगला नहीं सिंधिया का वो आशियाना था जहाँ उनका बाल्यकाल से लेकर यौवन के दिन और फिर राजनीतिक जीवन के सत्रह वर्ष खुशहाल गुजरे ।
इतना कुछ होने के बाद सिंधिया के उसूलों पर आँच आने लगी और वे कमलनाथ और अपनी उस कांग्रेस से टकराने को तैयार थे जिसने सत्रह वर्ष सत्ता का सुख ,दौलत,शौहरत और एक बड़ी फैन फॉलोइंग दी थी , इतना ही नहीं के सिंधिया परिवार की कभी न हारने वाली मुगालता ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को विवश कर दिया कि अब साबित करना होगा कि वे जिंदा है । इधर सिंधिया कांग्रेस के मंच से मध्यप्रदेश की जनता से कांग्रेस के दिए वचनों के लिए उनके साथ खड़े रहने जोश भर रहे थे तो दूसरी तरफ अपने एक मित्र के माध्यम से उसी भारतीय जनता पार्टी और शिवराज सिंह से संधि के लिए प्रयासरत थे जिसको उन्होंने किसानों की मौत का सौदागर और व्यापमं में युवाओं के भविष्य को तबाह करने वाले सरकार बताकर पानी पी पीकर कोसा था,जी हाँ, उसी भारतीय जनता पार्टी के साथ गले मिलने को आतुर थे जिसने 2018 के आम चुनाव में कांग्रेस को नहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया को कहा था कि "माफ करो महाराज" ।
एक वक्त ऐसा आया जब पार्टी से नाराज चल रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी के दरबार मे बुलाया गया तो सिंधिया तैयार होकर घर से निकले जरूर थे दफ्तर के लिए लेकिन गाड़ी की स्टेयरिंग कांग्रेस दफ्तर की ओर नहीं भाजपा दफ्तर कीओर मोदी और सिंधिया भाजपा के हो गए । इसके बाद तो मध्यप्रदेश की राजनीति में उथल पुथल मच गई ,सिंधियाई विधायक बैंगलोर के किसी होटल में कैद हो गए,और कांग्रेस की कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, सूबे की जनता कोरोना के भय से भयभीत थी और कांग्रेस सिंधिया के भाजपाई हो जाने से, आखिरकार हुआ वही जिसका डर था ,सिंधिया समर्थक बाईस विधायकों ने स्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और कमलनाथ की सरकार भरभराकर गिर गई जिसे भाजपा सुबह - शाम लँगड़ी सरकार बताया करती थी और एक बार फिर मध्यप्रदेश में शिव का राज आ गया ।
किंग मेकर की भूमिका अदा करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया की भाजपा से क्या डील हुई ये तो भारतीय जनता पार्टी और ज्योतिरादित्य सिंधिया ही जानें लिए शिवराज सरकार के पहले पांच मंत्रियों में दो मंत्री सिंधियाई थे, उसके बाद शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार में सिंधिया समर्थक 14 पूर्व विधायकों को मंत्री बनाया गया । भाजपा के साथ सिंधिया ने जनता के हिट में संधि की थी या फिर स्वयं के लिए, इस बात पर राजनीतिक पंडित बताते हैं कि सिंधिया की भाजपा आलाकमान से डील हुई कि खुद सिंधिया को राज्यसभा सांसद बनाकर केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बनाया जाएगा ,जितने विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ आएंगे सभी को उपचुनाव में टिकिट दिया जाएगा और ये 14 मंत्री भी बनाएंगे जाएँगे । गैर शर्त पर भाजपाई होने की ढींगे हाँकने वाले सिंधियाई नेता भले ही कुछ भी कहें लेकिन राजनीतिक गलियारों की चर्चा 24 कैरेट खरी साबित होने लगी, 14 मंत्री के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रभात झा जो कभी इन्हीं सिंधिया से लड़ते लड़ते पार्टी के बड़े नेता बने उन्हीं को किनारे कर राज्यसभा भेजा गया, अब देर सबेर ही सही मंत्री भी बनेंगे । इतनी बड़ी संख्या में जब स्टीफ़े हुए तो उपचुनाव तो होने ही थे ,सभी सीटों पर सिंधिया सकमर्थको को ही भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में उतारा और तो और भाजपा के वे सभी बड़े नेता कभी इन सिंधियाई नेताओं से हारे थे उपचुनाव में सड़क पर इनके लिए पसीना बहाते हुए देखे गए,ये जानते हुए भी कि यदि ये जीते तो उनका राजनीतिक भविष्य लगभग समाप्ति की ओर ही है । माफ करो महाराज कहने वाले शिवराज सिंह और शिवराज को खून से सने हाथ बताने वाले सिंधिया ने शायद ही मौका छोड़ा होगा जब जोश में गले न मिले हों । उपचुनाव के परिणाम में सिंधियाई तीन मंत्री चुनाव हार गए,जिनमें से नए नवेले सिंधियाई ( दिग्गी समर्थक थे पहले ) इन्दल सिंह कंषाना ने नैतिकता के आधार पर अपना स्तीफा सौंफ दिया लेकिन इमरती देवी और गिर्राज दंडौतिया स्तीफा देने को भी तैयार नहीं थे,हालांकि अपने महाराज के आदेश के बाद नेताद्वय ने भी स्तीफा सौंफ़ा जिसे लंबे समय तक शिवराज सिंह ने लंबित रखा और स्वीकृति न देते हुए कैबिनेट की बैठक में इमरती देवी को तवज्जों देते रहे । इन तीन मंत्रियों के चुनाव हार जाने से और शेष सीटों पर भाजपा के वरिष्ठता सूची में शामिल विधायक अपनी जगह मंत्रिमंडल में देखने लगे । चुनाव बिट गया, सरकार बन गई, जो सिंधियाई विधायक/मंत्री फिर चुनाव जीतकर पहुंचे वे यथावत अपना काम देखने लगे लेकिन शायद सिंधिया का ही दबाव रहा होगा कि शिवराज सिंह अपने मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहे थे, सिंधिया लगातार संगठन और सरकार में अपने समर्थकों को जगह देने के दबाव के लिए लगातार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री से मुलाकात करते रहे, यही कारण है कि देर से ही सही लेकिन शिवराज ने मंत्रिमंडल का विस्तार तो किया लेकिन मूल भाजपाई को शामिल नहीं किया बल्कि उन दो चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह दी जो कभी सिंधिया के साथ भाजपा का दामन थाम कर किंग मेकर की भूमिका में थे लेकिन जब शिवराज सिंह ने अपने पाँच सहयोगियों के तौर पर मंत्री बनाए तो उनमें सिंधियाई तुलसीराम सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत का नाम भी शामिल था,हालांकि ये नेताद्वय कमलनाथ सरकार में भी कैबिनेट मंत्री के तौर पर कार्यरत थे, लेकिन उपचुनाव देरी से होने के कारण उपचुनाव से पूर्व ही गैर विधायक के तौर पर उन्हें छः माह का कार्यकाल पूरा होने के कारण संवैधानिक व्यवस्था के चलते स्तीफा देना पड़ा । शिवराज सिंह और भारतीय जनता पार्टी सिंधिया के आने से मजबूत तो हुई है लेकिन साथ ही मजबूर भी अधिक दिखाई देती हैं क्योंकि मजबूर न होती तो इन दो सिंधियाई मंत्रियों के साथ अपने पुराने सहयोगियों को शिवराज सिंह जरूर तवज्जों देते और मंत्रिमंडल में जगह भी , अब अपने ही घर में भाजपा को विरोध के स्वर सुनाई देने लगे हैं, सिंधिया का दखल अभी नगरीय निकाय चुनाव में भी देखने मिलेगा इतना ही नहीं अभी सिंधिया को स्वयं को मोदी सरकार में मंत्री के रूप में देखना है, सिंधिया के वचनों में बँधी भाजपा मजबूत न होकर मजबूर हो गई है और सिंधिया भारतीय जनता पार्टी से केवल अपने वचन पूरे कराने के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे हैं न कि जिन वचनों के लिए वे कांग्रेस सरकार को छोड़कर सड़क पर उतरने ही हुँकार भरा करते थे । तेज तर्रार शैली के लिए जाने जाने वाले सिंधिया संघम शरणम गच्छामि होकर भारतीय जनता पार्टी में अपनी जगह सुनिश्चित करने की भरकस कोशिश में है लेकिन भाजपा और संघ सिंधिया को कितना महत्व देते हैं ये तो निकट भविष्य ही बताएगा ,क्योंकि भाजपा के इतिहास पर गौर करें तो यहाँ संघ की नर्सरी से निकलने वाले को ही अधिक महत्व मिलता है और अन्य दल से आने वाले कम ही हैं जो भाजपा में सक्रिय राजनीति कर रहे हैं ।
नोट- ये लेखक के अपने निजी विचार हैं
लेखक - इंजी. वीरबल सिंह ( स्वतंत्र लेखक )
