सागर -अच्छा प्रबंधक वह होता है जो सभी पदार्थों का ठीक से उपयोग करना जानता है, जो पदार्थों का उपयोग करना नहीं जानता है। वह आवेग में आकर किसी को भी बुरा और किसी को भी अच्छा कह देता है, जो आवेग से युक्त होता है। वह संसार के किसी पदार्थ को अच्छा और बुरा कहने लगता है। साक्षी भाव से ज्ञान करने वाला व्यक्ति सुखी और दुखी नहीं होता है जो सिर्फ रागद्वेष करता है, विकल्प करता है, कल्पना में उलझ जाता है। वही दुखी अथवा सुखी होता है। सुखी बनने का उपाय है कल्पना में नहीं उलझना। उक्त आशय के विचार राष्ट्रसंत ऐलकश्री सिद्धांत सागर महाराज ने व्यक्त किए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
