पोहरी। शिवपुरी जिला मुख्यालय से दूर पोहरी तहसील का छोटा सा गाँव बटकाखेड़ी आज पोषण और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहा है। करीब 35 परिवारों वाले इस गाँव में कभी दो वक्त की रोटी का संघर्ष करने वाले परिवार अब अपने आंगन में उगाई ताजी सब्जियों से पोषणयुक्त भोजन कर रहे हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी कहानी कुसुम आदिवासी के परिवार की है।
मजदूरी पर निर्भर था परिवार, सब्जी नसीब से मिलती थी
कुसुम और उनके पति शिव सिंह आदिवासी के पास खुद की जमीन नहीं थी। दोनों मजदूरी करते थे और काम न मिलने पर पलायन करना पड़ता था। घर में सब्जी तभी बनती थी जब मजदूरी मिल जाती, बाकी दिनों में लाल चटनी और रोटी से ही गुजारा होता था।
पोषण की कमी के कारण उनके तीनों बच्चे अक्सर बीमार रहते थे और खून की कमी से जूझते थे। मजदूरी की कमाई का बड़ा हिस्सा इलाज में ही खर्च हो जाता था, जिससे हरी सब्जियां खरीदना संभव नहीं था।
पोषण वाटिका बनी बदलाव की वजह
विकास संवाद संस्था द्वारा ‘समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन परियोजना’ के तहत कृषि विज्ञान केंद्र के सहयोग से गाँव में पोषण वाटिका लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया। गाँव के 35 परिवारों में से 20 परिवारों ने अपने घरों में पोषण वाटिका तैयार की।
संस्था ने कद्दू, टमाटर, तुरई, सेम, गोभी, बैंगन, लौकी, करेला, मिर्च और धनिया सहित कई सब्जियों के बीज उपलब्ध कराए। कुसुम भी इन जागरूक महिलाओं में शामिल रहीं।
अब थाली में 4-5 तरह के खाद्य समूह
आज कुसुम के घर के आंगन में लहलहाती सब्जियां उनके परिवार की सेहत का आधार बन चुकी हैं। पोषण वाटिका से उन्हें प्रतिदिन लगभग 35 रुपये की सब्जी की बचत हो रही है, यानी हर महीने करीब 1050 रुपये और छह महीने में 6300 रुपये की सीधी बचत हुई है।
कुसुम बताती हैं कि अब उनके परिवार को ताजी और शुद्ध सब्जियां घर पर ही मिल जाती हैं। बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है और थाली में अब सिर्फ चटनी-रोटी नहीं बल्कि 4-5 तरह के पोषक खाद्य शामिल होते हैं। मेहमान आने पर भी बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
गाँव में बन रही प्रेरणा
बटकाखेड़ी में पोषण वाटिका ने न केवल कुपोषण कम करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, बल्कि आर्थिक बचत और आत्मनिर्भरता का रास्ता भी दिखाया है। कुसुम आदिवासी जैसी महिलाएं अब पूरे गाँव के लिए प्रेरणा बन रही हैं।